हरिदास रचित; साप्ताहिक कॉलम ‘खुरचन’
(Weekly column ‘Khurchan’)रायपुर में यातायात केवल यात्रा नहीं है। यह जीवन-दर्शन है। किसी ने पूछा—“रायपुर कितना विकसित हो गया?” जवाब मिला—“इतना कि अब जाम में खड़े रहने के लिए भी पर्याप्त वाहन उपलब्ध हैं।”
शहर में जनसंख्या बढ़ी। वाहन बढ़े। बाजार बढ़े। मकान बढ़े। कॉलोनियां बढ़ीं। लेकिन सड़कें बेचारी अपनी पुरानी उम्र में ही खड़ी रहीं। उन्हें देखकर लगता है कि विकास ने उनसे कहा—
“तुम यहीं रहो, मैं तुम्हारे ऊपर से निकल जाऊंगा।” और विकास ने फ्लाईओवर बना लिया। एक फ्लाईओवर खत्म हुआ तो दूसरा प्रस्तावित हो गया। एक लिंक रोड बनी तो दूसरी की जरूरत महसूस हुई। समस्या का समाधान निकला नहीं, समस्या ने अपने अगले संस्करण की घोषणा कर दी।
रायपुर में कभी डबल डेकर बस की जरूरत नहीं पड़ी, लेकिन अब लगता है कि डबल डेकर फ्लाईओवर की जरूरत जरूर पड़ सकती है। एक फ्लाईओवर के ऊपर दूसरा फ्लाईओवर—नीचे जाम रहे तो ऊपर से निकल जाइए, और ऊपर भी जाम हो जाए तो फिर अगली मंजिल के बारे में सोचिए। आखिर विकास भी तो रुकना नहीं चाहिए!नीचे पैदल आदमी पूछेगा—“भाई साहब, जाना किधर है?” ऊपर से कार वाला जवाब देगा—“पहले यह बताइए कि मैं किस लेयर में हूं!” दिल्ली, उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे बड़े शहरों में डबल डेकर फ्लाइओवर बने हैं। रायपुर भी महानगरीय जीवन की उसी दिशा में बढ़ रहा है। फर्क बस इतना है कि वहां जाम पुराना है और हमारे यहां जाम नया होते हुए भी पुराना दिखाई देता है। हमारे यहां विकास की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वह समस्या को खत्म नहीं करता, उसे बड़ा कर देता है। पहले छोटा जाम था। फिर बड़ा जाम हुआ। अब बहुस्तरीय जाम की तैयारी है।
कल को कोई पूछेगा—“रायपुर में सबसे ऊंची इमारत कौन-सी है?”
जवाब आएगा—“जहां सबसे ऊंचा फ्लाईओवर है।”
रायपुर अब राजधानी है। राजधानी होने के साथ उसकी जिम्मेदारियां भी बढ़ीं। आसपास के कस्बों और गांवों से लोग आते हैं। कारोबार बढ़ा। सरकारी दफ्तर बढ़े। शिक्षा, इलाज, खरीदारी और रोजगार के लिए लोगों का आना-जाना बढ़ा। स्वाभाविक है कि यातायात का दबाव भी बढ़ेगा। लेकिन सवाल यह है कि क्या हम केवल सड़क बनाकर यातायात की समस्या हल कर सकते हैं? शायद नहीं। क्योंकि सड़क जितनी चौड़ी होगी, वाहन उतने ही बढ़ेंगे। वाहन बढ़ेंगे तो फिर सड़क छोटी पड़ जाएगी। फिर सड़क चौड़ी होगी। फिर वाहन बढ़ेंगे। यह ऐसा ही है जैसे पेट की बीमारी का इलाज करने के लिए पैंट का साइज बढ़ाते जाना। रायपुर को केवल और सड़कें नहीं चाहिए। उसे ऐसी यातायात व्यवस्था चाहिए जिसमें सार्वजनिक परिवहन मजबूत हो, पैदल चलने वाले सुरक्षित हों, साइकिल के लिए जगह हो, पार्किंग की व्यवस्था हो, बाजारों और कार्यालयों की यातायात योजना बने और शहर का विकास केवल सड़क के ऊपर नहीं, सड़क के चारों तरफ भी योजनाबद्ध हो। वरना फ्लाईओवर बनते रहेंगे और नीचे जाम भी बनता रहेगा।
हम कहेंगे—“देखिए, कितना विकास हुआ!” जाम में फंसा आदमी कहेगा—“हां, दिख रहा है। सामने वाले चौराहे तक पहुंचने में बस पैंतालीस मिनट और लगेंगे।” फिर कोई अधिकारी बताएगा—“शहर को भविष्य की जरूरतों के हिसाब से तैयार किया जा रहा है।”
नागरिक पूछेगा—“भविष्य कब आएगा?”
अधिकारी कहेगा—“बहुत जल्दी।”
नागरिक घड़ी देखेगा। सामने लाल बत्ती जल रही होगी। वह फिर पैंतालीस मिनट इंतजार करेगा और रायपुर विकास की अगली घोषणा का इंतजार करता रहेगा। क्योंकि यहां विकास कभी रुकता नहीं। बस यातायात रुक जाता है। कल को शायद गणेश पंडाल भी मल्टीलेवल होंगे, पार्किंग भी मल्टीलेवल होगी और जाम भी। तब गणेश जी से प्रार्थना करनी पड़ेगी—
“बप्पा, इस बार मोदक बाद में देना, पहले रायपुर के ट्रैफिक का विसर्जन करवा देना।”
रायपुर में बढ़ती भीड़ का आलम यह है कि गणेश पंडालों में लोगों को डराने और मनोरंजन करने के लिए खड़े किए गए भूत भी अब खुद डरे हुए नजर आने लगे हैं। जिन भूतों को देखकर लोग चीखते और रोमांचित होने आते थे, वे ही भीड़ और ट्रैफिक देखकर सहमे खड़े हैं।
एक भूत दूसरे से कह रहा है—
“हम तो लोगों को डराने आए थे, यहां तो भीड़ ही हमसे ज्यादा डरावनी निकली!”
दूसरा बोला—
“पहले लोग हमें देखकर रास्ता बदलते थे, अब हमें ही रास्ता नहीं मिल रहा!”
रायपुर में जाम इतना बढ़ गया है कि भूत भी सोचने लगे हैं—डराना किसे है और डरना किससे है! भूतों ने आखिरकार समिति से कह दिया, “हमें डरावना बनाने की जरूरत नहीं है। रायपुर का ट्रैफिक दिखा दीजिए, लोग अपने आप डर जाएंगे।”







