साप्ताहिक कॉलम “खुरचन”
(Weekly Column by Haridas)गणपति बप्पा आ गए हैं। घरों में खुशियां हैं, पंडालों में रोशनी है और मोहल्लों में भक्ति का माहौल है। गणेशोत्सव का मूल उद्देश्य समाज को जोड़ना, भाईचारा बढ़ाना और लोगों को एकता के सूत्र में बांधना रहा है। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक जी ने 1893 में जब इसे सार्वजनिक उत्सव का रूप दिया था, तब इसके पीछे सामाजिक और राष्ट्रीय चेतना जगाने की भावना थी। अंग्रेजों के खिलाफ लोगों को एक मंच पर लाना था। आज गणेशोत्सव पूरे देश में धूमधाम से मनाया जाता है।
भगवान श्री गणेश बुद्धि के देवता हैं और कुछ लोगों को सद्बुद्धि की जरूरत सबसे ज्यादा पड़ती है। क्योंकि कुछ जगह त्योहार की आड़ में ऐसी गतिविधियां दिखाई देने लगी हैं, जिनका पूजा और त्योहार की मूल भावना से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं रहता है। प्रशासन की अनुमति के बिना पंडाल के नाम पर सड़कें घेर दी जाती है। व्यवस्था के अभाव में कहीं ऐसी भीड़ एकत्र कर दी जाती है कि भगवान तक पहुंचने के लिए भक्त को पहले जाम की परीक्षा पास करनी पड़ती है। एम्बुलेंस फंस जाए तो भगवान से प्रार्थना कीजिए कि मरीज की किस्मत गणपति बप्पा से मजबूत हो।
सांस्कृतिक कार्यक्रम भी होने चाहिए। आखिर संस्कृति बचाने की जिम्मेदारी भी तो जरूरी है, लेकिन संस्कृति बचाने के नाम पर रात-दिन तेज आवाज, राजनीतिक भाषण और शक्ति प्रदर्शन भी देखने को मिलता है। संस्कृति भी बेचारी पूछने लगती है कि मुझे बचाया जा रहा है या मेरे नाम पर कुछ और किया जा रहा है? वह शायद सोचती होगी कि अगर मुझे इसी तरह बचाया गया तो अगली बार मुझे बचाने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।
गणपति बप्पा को शायद इस बात पर आश्चर्य होता होगा कि लोग उनसे विघ्न दूर करने की प्रार्थना करते हैं और फिर खुद दूसरों के रास्ते में विघ्न बन जाते हैं। उनसे शांति मांगते हैं और फिर ऐसा शोर करते हैं कि शांति बेचारी गाँव के किसी पुराने घर में जाकर छिप जाती है। शहर में तेज आवाज और कंपन से नुकसान की घटनाओं की खबरें आती रही हैं। कहीं जर्जर इमारत गिर जाती है, कहीं कारों के शीशे टूट जाते हैं, लोगों के कान और दिल तक खराब हो जाते हैं, मगर डीजे चलता रहता है। ऐसा लगता है कि डीजे ने प्रशासन से स्थायी समझौता कर रखा है, तुम आदेश निकालते रहो, मैं आवाज निकालता रहूंगा।
अदालत आदेश देती है। अधिकारी निर्देश देते हैं। पुलिस समझाती है। फिर डीजे बजता है। यानी व्यवस्था में सबकी भूमिका तय है—अदालत आदेश देगी, प्रशासन अपील करेगा, पुलिस समझाएगी और डीजे वाला बाबू गाना बजाएगा। जनता भी बड़ी सहनशील है। कान बंद कर लेती है। खिड़की बंद कर लेती है। टीवी बंद कर देती है। बच्चे पढ़ाई छोड़ देते हैं। बुजुर्ग सोने की कोशिश छोड़ देते हैं। मरीज करवट बदलता रहता है। लेकिन डीजे बंद नहीं होता। जनता को सहना ही पड़ेगा। यह शायद हमारे लोकतंत्र का नया सिद्धांत है—जिसकी आवाज सबसे तेज, उसकी श्रद्धा सबसे बड़ी और जिसकी परेशानी सबसे ज्यादा, उसकी आवाज सबसे छोटी।
भगवान गणेश बुद्धि और विवेक के देवता माने जाते हैं। लेकिन कुछ लोगों का विवेक विसर्जित हो जाता है। विसर्जन के दौरान नशे में धुत्त लोग नागिन डांस में मशगूल रहते हैं। कोई सड़क पर झूम रहा होता है, कोई चिल्लाता रहता है, कोई भीड़ में जानबूझकर दूसरों को धक्का देने में व्यस्त रहता है। बप्पा भी शायद सोचते होंगे कि मेरी पूजा में यह कौन-सा अध्याय पढ़ाया जा रहा है?
त्योहार मनाइए। पूरे उत्साह से मनाइए। गणपति को घर लाइए, पंडाल सजाइए, आरती कीजिए, सांस्कृतिक कार्यक्रम कीजिए, प्रसाद बांटिए और मिल-जुलकर खुशी मनाइए। लेकिन इतना भी याद रखिए कि भगवान को प्रसन्न करने के लिए जनता को परेशान करना जरूरी नहीं है।
गणपति बप्पा को शायद ऊंचे डीजे की जरूरत नहीं। उन्हें शायद यह ज्यादा पसंद आए कि विसर्जन के रास्ते में किसी बुजुर्ग को परेशानी न हो, किसी मरीज की एम्बुलेंस न फंसे, किसी बच्चे की नींद न टूटे, किसी दुकानदार से जबरन चंदा न लिया जाए और किसी सड़क को श्रद्धा के नाम पर अनिश्चितकाल के लिए बंद न किया जाए।
लोकमान्य तिलक ने गणेशोत्सव को लोगों को जोड़ने के लिए सार्वजनिक बनाया था। आज जरूरत है कि हम फिर उसी भावना को याद करें।
भक्ति में शक्ति हो, प्रदर्शन में नहीं।
उत्सव में उल्लास हो, उत्पात नहीं।
चंदे में स्वेच्छा हो, दबाव नहीं।
संगीत में माधुर्य हो, कानफोड़ू शोर नहीं।
उत्साह हो, लेकिन किसी की सेहत की कीमत पर नहीं।
और विसर्जन में श्रद्धा हो, नशे और हुड़दंग का प्रदर्शन नहीं।
बाकी गणपति बप्पा सब देख रहे हैं।
बस इस बार उनसे एक प्रार्थना और कर दीजिए—
“बप्पा, विघ्न तो आप दूर कर ही देना, लेकिन पहले हम सबको थोड़ी सद्बुद्धि दे देना। ताकि आपके नाम पर जनता को ही विघ्न न झेलना पड़े।”





