सरकारी लूट का डिजिटल अवतार
द्वारा – हरिदास
महिषासुर के बारे में सुना था कि वह देवताओं और मनुष्यों को परेशान करता था। अब स्मार्ट मीटर आ गया है। फर्क इतना है कि महिषासुर से मुक्ति के लिए माँ दुर्गा को आना पड़ा था, और स्मार्ट मीटर से मुक्ति के लिए फिलहाल लोगों को बिजली विभाग के दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं।
स्मार्ट मीटर लगने के बाद आदमी बिजली का बिल देखकर खुद भी जलने लगा है। बिल चार गुना! मानो घर में पंखा, बल्ब और कूलर नहीं, बिजली का कोई राक्षस बैठा हो, जो रात-दिन यूनिटें निगल रहा हो। और इस राक्षस की खूबी देखिए—इसे भूख लगती है तो जेब पर हमला करता है, और पैसा न मिले तो घर का अँधेरा निगलने के बजाय रोशनी ही निगल जाता है। एक महीने का बिल नहीं भरा, आटोमेटिक मशीन ने बिजली काट दी! न कोई मानवीय संवेदना, न परेशानी समझने की जरूरत। मशीन को क्या मालूम कि घर में बूढ़े माँ-बाप हैं, बच्चे पढ़ते हैं, मजदूर की मजदूरी अटकी है या परिवार पहले से महँगाई के महिषासुर से लड़ रहा है!
व्यवस्था कहती है—मीटर स्मार्ट है।
जनता पूछती है—साहब, मीटर स्मार्ट है तो बिल चार गुना क्यों? और अगर बिल सही है तो हिसाब समझाने में व्यवस्था की बुद्धि कहाँ चली जाती है?
महिषासुर कम-से-कम पौराणिक कथा में था। यह वाला घर-घर में लगा दिया गया है। उसके हाथ में हथियार था, इसके हाथ में डिजिटल तकनीक है। वह युद्ध करके डराता था, यह बिल भेजकर डराता है। वह प्रजा पर अत्याचार करता था, यह गरीब की जेब पर सीधा प्रहार करता दिखाई देता है। लेकिन असली सवाल मीटर का नहीं, उस व्यवस्था का है जो तकनीक को जनता की सुविधा से अधिक वसूली का औजार बना दे।
स्मार्ट मीटर लगाइए, लेकिन बिल भी समझदार बनाइए। तकनीक लाइए, लेकिन इंसानियत को बिजली काटकर बाहर मत कीजिए। क्योंकि जनता को ऐसी स्मार्ट व्यवस्था नहीं चाहिए, जिसमें मीटर चौबीस घंटे जागता रहे और गरीब का घर चौबीस घंटे बिल की चिंता में सो न सके।
जनता अब पूछने लगी है कि महिषासुर का वध तो देवी ने किया था, लेकिन इस नए डिजिटल महिषासुर से हमें कौन बचाएगा?
हैरानी की बात है कि छत्तीसगढ़ बिजली पैदा करने में सरप्लस है, लेकिन अपने ही लोगों को सस्ती बिजली देने में कंगाल! कोयला हमारा, बिजलीघर हमारे, उत्पादन हमारा—मगर बिजली के बिल भरते वक्त जनता की जेब पर ही करंट क्यों लगता है? छत्तीसगढ़ में बिजली पैदा जनता के लिए होती है और महँगी जनता की ही किस्मत में लिखी जाती है!
गांव का किसान हो या शहर का मध्यमवर्गीय परिवार, दिहाड़ी मजदूर हो या छोटा दुकानदार—आज हर कोई स्मार्ट मीटर के नाम पर आ रहे बिजली बिलों से हलाकान है। कहीं बिल कई गुना उछलकर गरीब की कमर तोड़ रहा है, तो कहीं पर्याप्त सूचना दिए बिना बिजली काटकर लोगों को अंधेरे में धकेल दिया जा रहा है। विडंबना देखिए, जिस तकनीक का दावा बिजली व्यवस्था को स्मार्ट बनाने के लिए किया गया था, वही आम आदमी के लिए मुसीबत का मीटर बनती जा रही है। सवाल यह है कि स्मार्ट मीटर बिजली कंपनियों की कमाई बढ़ाने के लिए हैं या जनता की परेशानी घटाने के लिए? अगर तकनीक इतनी ही स्मार्ट है, तो फिर जनता की जेब पर पड़ने वाली यह मार और बिना चेतावनी गुल होती बिजली किसकी नाकामी है? मीटर स्मार्ट हो गए, व्यवस्था डिजिटल हो गई, लेकिन जनता के प्रति जवाबदेही आज भी अंधेरे में है!
हलाकान लोग गुहार लगा रहे हैं, “हे माँ दुर्गे! इस महिषासुर रूपी सरकारी लूट के डिजिटल अवतार स्मार्ट मीटर से मुक्ति दिलाओ। बिजली का बिल देखकर दिल बैठ जाता है, शिकायत लेकर विभाग जाओ तो चक्कर लगाते-लगाते चप्पल घिस जाती है, और सुनवाई न हो तो अंधेरे में रात बितानी पड़ती है!”
जाहिर है कि बिजली का सरप्लस तभी सार्थक है, जब जनता का बिल कम हो, किसान की लागत घटे, कारोबार को ताकत मिले और घर रोशन रहें। वरना बिजली उत्पादन के आंकड़े भले चमकते रहें, जनता की जिंदगी में उनका उजाला कहाँ है?







