द्वारा -हरिदास
हर साल विजयदशमी आती है। रामलीला होती है। राम तीर चलाते हैं। रावण धू-धूकर जलता है। पटाखे फूटते हैं। तालियां बजती हैं। लोग खुश होते हैं कि सत्य ने असत्य को हरा दिया। फिर सब अपने-अपने घर चले जाते हैं।
अगली सुबह रावण फिर जिंदा मिलता है और कहता है- हर साल मेरा पुतला जलाकर इतने खुश क्यों होते हो? पटाखे फोड़ते हो, तालियां बजाते हो, मिठाइयां खाते हो और समझते हो कि रावण मर गया! अरे नादानो, वह पुतला था, मैं नहीं! मैं तो तुम्हारी महंगाई में हूं, भ्रष्टाचार में हूं, सरकारी लूट में हूं, बेरोजगारी में हूं। मैं नशे में हूं, महिला हिंसा में हूं, बुजुर्गों की उपेक्षा में हूं, लूटपाट में हूँ, नैतिक पतन में हूँ। तुम्हारी सोच में हूँ, तुम्हारे अहंकार में हूँ। तुम हर साल मेरा एक पुतला जलाते हो, मैं हजार रूपों में तुम्हारे सामने खड़ा हो जाता हूं।
तुम्हारे तीर खत्म हो जाएंगे, तुम्हारी आतिशबाजी बुझ जाएगी, तुम्हारे उत्सव बीत जाएंगे। मगर जब तक मेरी बुराइयों को पालने वाले मौजूद हैं, मेरा राज चलता रहेगा।
समझे! मैं हूं रावण… रावण राज! मैं मरेगा नहीं साला!”
रावण कभी मैदान में खड़ा पुतला नहीं रहा, हमारे समाज की स्थायी व्यवस्था बना हुआ है।
महंगाई का रावण आम आदमी की जेब पर बैठा है। आदमी बाजार जाता है तो जरूरतों की सूची लंबी और जेब छोटी पड़ जाती है। दाल, सब्जी, तेल और गैस का हिसाब लगाते-लगाते महीने का बजट दम तोड़ देता है। वेतन आते ही खर्चों के दस सिर उसे चारों तरफ से घेर लेते हैं। दशहरे पर रावण के दस सिर जलते हैं, आम आदमी की जेब में हर महीने दस नए छेद हो जाते हैं।
भ्रष्टाचार का रावण तो और भी चतुर है। वह नियम-कानून की भाषा जानता है। सरकारी दफ्तर में उसकी फाइल कभी अटकती नहीं, बस आम आदमी की फाइल अटक जाती है। नागरिक पूछता है, “साहब, काम कब होगा?” जवाब मिलता है, “प्रक्रिया चल रही है।” प्रक्रिया चलती रहती है, काम वहीं खड़ा रहता है। आदमी के चप्पल घिस जाते हैं, लेकिन व्यवस्था के कान पर जूं नहीं रेंगती।
सरकारी लूट का रावण जनता के पैसे से अपना साम्राज्य खड़ा कर रहा है। स्मार्ट मीटर और ई-चालान से भला कौन वाकिफ नहीं है। नशे का रावण घरों में घुसकर परिवार की खुशियां निगल रहा है। उसकी कीमत केवल नशा करने वाला व्यक्ति नहीं चुकाता; पत्नी, बच्चे और माता-पिता भी चुकाते हैं। मंचों से नशामुक्ति के नारे लगते हैं, मगर नशे के कारोबार के सामने सामाजिक इच्छाशक्ति कई बार कमजोर पड़ जाती है। नशे का यह रावण किसी मैदान में नहीं जलता। यह घर-परिवार, दोस्ती और रिश्तों को जलाता रहता है। बेरोजगारी का रावण पढ़े-लिखे युवाओं की डिग्रियों पर हंसता रहता है। युवा परीक्षा देता है, तैयारी करता है, भर्ती का इंतजार करता है। कभी परीक्षा अटकती है, कभी परिणाम और कभी नियुक्ति। उम्र निकल जाती है, आश्वासन नहीं निकलते। हर चुनाव में रोजगार का तीर छोड़ा जाता है। रावण घायल होने का अभिनय करता है और अगले चुनाव तक फिर स्वस्थ हो जाता है।
महिला हिंसा का रावण हमारी नैतिकता का सबसे कुरूप चेहरा है। एक ओर देवी की पूजा होती है, दूसरी ओर महिलाओं को हिंसा, उत्पीड़न और असुरक्षा का सामना करना पड़ता है। एक तरफ नारी शक्ति का जयघोष होता है दूसरी तरफ घर से बाहर निकलती बेटी को अपनी सुरक्षा की चिंता करनी पड़ती है। यह कैसी भक्ति है, जिसमें देवी के सामने सिर झुकता है, लेकिन जीवित महिला के सम्मान के सामने अहंकार खड़ा हो जाता है? महिला सुरक्षा के लिए केवल नारे नहीं, प्रभावी कानून-व्यवस्था, निष्पक्ष कार्रवाई और घर से शुरू होने वाले संस्कार चाहिए।
इन सबके बीच एक और रावण पलता है—हमारी चुप्पी का रावण।
हम भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलते हैं, लेकिन अपना काम निकलवाने के लिए नियम तोड़ने को तैयार हो जाते हैं। हम सड़क पर अव्यवस्था को कोसते हैं, लेकिन खुद नियमों की अनदेखी करते हैं। अन्याय किसी दूसरे के साथ होता है तो हम तमाशबीन बने रहते हैं। अपने ऊपर आती है, तभी न्याय याद आता है। सड़क पर कोई मर रहा रहा होता तो हम मानवीय संवेदनाओं को ताक पर रखकर पहले वीडियो बनाने लगते हैं। एक सच यह भी तो है कि हम चाहते हैं कि रावण मरे, मगर उसकी किसी न किसी भुजा से हमारा अपना काम भी निकलता रहे।
यही रावण की असली ताकत है। वह केवल दूसरों के भीतर नहीं रहता; हमारी स्वार्थपरता, समझौतों और चुप्पियों में भी जगह बना लेता है। लेकिन सारी जिम्मेदारी नागरिकों पर डालकर व्यवस्था को बरी नहीं किया जा सकता। भ्रष्टाचार रोकना, रोजगार के अवसर पैदा करना, महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना और सार्वजनिक धन का हिसाब देना सरकार तथा संस्थाओं की भी जिम्मेदारी है।
तो फिर रावण का दहन कैसे हो?
महंगाई से राहत देने वाली नीतियों से, भ्रष्टाचार पर कार्रवाई से, सरकारी धन की निगरानी से, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से, रोजगार के वास्तविक अवसरों से, महिलाओं के सम्मान से और बुजुर्गों की सुरक्षा से। सबसे बढ़कर, गलत को गलत कहने के साहस से। विजयदशमी बुराई पर अच्छाई की विजय का पर्व है। लेकिन विजय का अर्थ केवल बुराई का प्रतीक जलाना नहीं, बुराई को कमजोर करना भी है। पुतले के साथ अन्याय के प्रति हमारी उदासीनता भी जलनी चाहिए।वरना हर साल वही दृश्य दोहराया जाएगा। रावण का पुतला जलेगा, आतिशबाजी होगी, तालियां बजेंगी। अगली सुबह महंगाई का रावण दुकान खोल लेगा, भ्रष्टाचार का रावण दफ्तर पहुंच जाएगा और बेरोजगारी का रावण युवाओं की कतार में खड़ा मिलेगा।
सवाल यह नहीं कि रावण हर साल क्यों जलता है। सवाल यह है कि वह हर साल जिंदा कैसे हो जाता है?
शायद इसलिए कि हम रावण का पुतला जलाने में जितनी दिलचस्पी लेते हैं, उसके साम्राज्य को खत्म करने में उतनी नहीं लेते।
जिस दिन रावण के पुतले के साथ उसके भीतर की बुराइयां भी जलने लगेंगी, उसी दिन विजयदशमी केवल उत्सव नहीं, समाज की वास्तविक विजय बनेगी। आप सभी को ‘शहर सत्ता’ की तरफ से विजय दशमी की हार्दिक शुभकामनाएं…





