Weekly Column : खुरचन; स्मार्ट मीटरः बिजली आई, अंधेरा लाई…!

द्वारा–हरिदास

(Weekly Column)हमारे यहाँ स्मार्ट मीटर आए तो लगा कि बिजली व्यवस्था “स्मार्ट” होगी। आम आदमी ने सोचा, बिल कम आएगा, चोरी रुकेगी, हिसाब साफ होगा। लेकिन हुआ उल्टा। स्मार्ट तो मीटर निकला, उपभोक्ता अपने आपको पहले से ज्यादा मूर्ख महसूस करने लगा है। घर की दीवार पर टंगा बिजली का मीटर देखो तो लगता है वह छाती पर चढ़ बैठा है। पहले मीटर यूनिट गिनता था, लेकिन अब आदमी की औकात गिनने में मशगूल है। जिस आदमी का आठ सौ रुपये का बिल आता था, वह अब चार हजार रुपये का बिल देखकर अपने घर के पंखे को ऐसे घूरता है जैसे वही रात में चोरी-छिपे किसी फैक्ट्री का मोटर चला रहा हो। उसे याद आने लगता है कि कहीं उसकी एलईडी बल्ब ने आधी रात को औद्योगिक उत्पादन तो शुरू नहीं कर दिया था। फिर मज़ा तो तब आता है जब बिल पूरा भर देने के बाद अगले महीने “पूर्व बकाया” फिर मुस्कराता हुआ सामने खड़ा मिलता है। यह ऐसा बकाया है, जो नेताओं के वादों की तरह कभी खत्म नहीं होता। आप जितना चुकाइए, उतना ही नया इतिहास निकल आता है।
जब उपभोक्ता जबरन पूर्व बकाया जोड़ने की शिकायत लेकर बिजली दफ्तर पहुँचता है तो अधिकारी बड़े आत्मविश्वास से बताते हैं—”ओवरलोड पहले जोड़ा नहीं गया था, अब जोड़ दिया है।” यानी गलती हमारी थी, भुगतान आपका होगा। यह वैसा ही न्याय है जैसे पड़ोसी की शादी में मिठाई कम पड़ जाए और बिल मोहल्ले के सबसे सीधे आदमी को थमा दिया जाए।
हर दिन हजारों लोग शिकायत लेकर पहुँच रहे हैं। शिकायतें इतनी हैं कि लगता है बिजली दफ्तर नहीं, लोकतंत्र का कुंभ लगा हो। फर्क सिर्फ इतना है कि वहाँ आस्था से लोग पाप धोने जाते हैं, यहाँ बिल धोने आते हैं। दोनों जगह लौटते समय आदमी पहले से हल्का नहीं, थोड़ा और भारी हो जाता है।
उपभोक्ता डरता भी है। बिल भरो तो जेब कटती है, न भरो तो बिजली कटती है। लोकतंत्र में इसे शायद “विकल्प की स्वतंत्रता” कहते होंगे। हम गर्व करते हैं कि सब कुछ डिजिटल हो रहा है। सच ही है—अब परेशानी भी डिजिटल हो गई है। पहले आदमी मीटर रीडर को ढूंढ़ता था, अब अपने ही बिल का मतलब ढूंढ़ता फिरता है। स्मार्ट मीटर ने एक नया दर्शन दिया है—बिजली चाहे जितनी जलाओ, उससे ज्यादा बिल की कल्पना जलती रहती है। लगता है आने वाले समय में घर के बाहर नेमप्लेट नहीं, सीधे बिजली बिल टांगना पड़ेगा, ताकि लोग हैसियत का अंदाज़ा वहीं से लगा लें।
कहते हैं तकनीक जीवन आसान बनाती है। शायद बनाती होगी। फिलहाल तो इतना जरूर हुआ है कि जनता ने बिजली बचाना कम और अपनी धड़कन बचाना ज्यादा सीख लिया है। हर महीने बिल आने की तारीख अब त्योहार नहीं, परीक्षा परिणाम जैसी लगती है। फर्क बस इतना है कि परीक्षा में फेल होने पर सप्लीमेंट्री मिल जाती है, बिजली के बिल में केवल “पूर्व बकाया” मिलता है।
शहर की आबो-हवा से ऊबकर गाँव पहुँची हमारी “बिजली” अपनी दाई से झल्ला कर कहती है—
“दाई, मोर नाम काबर बिजली रख दे हस?मोर नाव बदल दे। अब मोला अपन नाव बने नई लगय।”
दाई हँसते हुए बोली—”का होगे? एतका सुग्घर नाव, सब झन तारीफ करथें।”
बिजली बोली—
दाई, पहिली मोर नाव सुनके लोग मुस्कुरावत रहिन। अब जइसेच कहिथों—’मोर नाव बिजली हे’, बिजली’ सुनतेच मुंह लटक जाथे। पहिली पूछथे—’कतेक बिल आथे?’
कोनो कहिथे—’स्मार्ट मीटर वाली बिजली आय का?’
कोनो कहिथे—’तोर संग दोस्ती करबो त महीना भर के कमई बिल मं चल जाही।’
अब तो लइका मन घलो मोला देखके कहिथें—’भागव… बिल आ गे!’
थोड़ी देर चुप रहिके वो फेर बोली—
“दाई, पहिली प्रेमी मन कहत रहिन—’बिजली, तोर बिना जिनगी अंधियार हे।’ अब कहिथें—’तोर नाव सुनतेच जेब कांपथे।’
“पहिली मोला देखके दिल धड़कत रहिस, अब बिजली के बिल देखके धड़कथे। अब त मोला कोनो आवाज देथे—’ए बिजली…’ त मैं मुड़के देखंव कि मोला बुलावत हें कि बिजली बिल ला गरियावत हें।”
दाई हँसत कहिथे—”त फेर का नाव रखबो?”
बिजली झट ले कहिथे—
“दाई, मोर नाव फूलमती रख दे, चंदा रख दे, कछु घलो रख दे… फेर बिजली झन रख। आजकल बिजली ले उजाला कम, बिल जियादा याद आथे।”
बहरहाल, जहाँ बिजली पैदा होती है, वहीं का उपभोक्ता बिजली का बिल देखकर अँधेरे में चला जाए, इससे बड़ा व्यंग्य और क्या होगा?

pradeep chandravanshi

जिला कवर्धा के ग्राम रुसे में जन्म लिया। खेती-किसानी के साथ शिक्षा और खेल में भी संतोषजनक सफलता मिली। वर्तमान में शहर सत्ता के लिए ख़बरों और प्रबंधन की महती जिम्मेदारी प्राप्त है। रायपुर प्रेस क्लब का विगत 9 वर्षों से सक्रीय सदस्य भी हूं।

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