शहर सत्ता/रायपुर। (Photo caption Pradeep Dadsena)महज 25-28 वर्ष का यह युवक ख़ामोशी से इन रास्तों में चहल कदमी करता रहता है। उसके हालात और आंखों को देखने से लगता है, मानो वह कह रहा है…ये दुनिया मेरे काम की नहीं ! छत्तीसगढ़ के लोकभवन (राजभवन) मार्ग से लेकर मुख्य आयकर आयुक्त के पुराने कार्यालय और आकाशवाणी दफ्तर से काली मंदिर चौक के रस्ते में दिन हो या रात एक काली परछाई बरबस ही ध्यान खींचती है।
पास ही की एक बस्ती में रिश्तेदार और कुछ परिजन रहते हैं लेकिन इसको देखकर लगता है कि इसे रिश्ता, रोटी, कपडा और मकान नहीं चाहिए। उसकी स्थिति देखकर यह नहीं कहा जा सकता कि वह यहां क्यों है और क्या कर रहा है। समझदार तो नहीं लगता…लेकिन क्या पूरा सिस्टम भी इससे नजरें फेर लिया है? लाखों रूपये बजट वाला समाज कल्याण विभाग और एनजीओ भी राजधानी की सड़कों में भटकते ऐसों की सुध नहीं लेता यह शर्मनाक है। आकाशवाणी चौक काली मंदिर में भी कई भक्त आते हैं वो सब भी इहलोक नहीं परलोक सुधारने में लगे है…ऐसे में इन जैसों की सुधी कौन लेगा ‘साहब’।





