Author K.D.P. Rao : विमानन का भू-अर्थशास्त्र और भारत

हवाई अड्डों को आर्थिक विकास के इंजन और वैश्विक भू-राजनीतिक प्रभाव के साधन के रूप में विकसित करने की दूरदर्शी सोच ही भारत का मार्गदर्शन कर सकती है; भारत यह कर सकता है


लेखक: के.डी.पी. राव
पूर्व अतिरिक्त मुख्य सचिव
सामान्यतः, एक मजबूत विमानन क्षेत्र प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध तथा सुनिश्चित घरेलू मांग वाले देशों में गुणक (Multiplier) प्रभाव के माध्यम से तीव्र आर्थिक विकास का उत्प्रेरक बनता है। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से, कुछ ऐसे देशों के लिए विमानन स्वयं एक आर्थिक संसाधन बन गया है, जिनके पास न तो पर्याप्त प्राकृतिक संसाधन हैं और न ही उत्पादन के पारंपरिक कारक। इन देशों ने विमानन के बल पर अभूतपूर्व आर्थिक विकास किया और वैश्विक भू-राजनीतिक शक्तियों के रूप में उभरे। इसका रहस्य “भू-अर्थशास्त्र (Geoeconomics)” में निहित है।

दुबई, सिंगापुर और तुर्की ऐसे देश हैं जिन्होंने वर्षों तक विमानन क्षेत्र में निरंतर निवेश करके विश्वस्तरीय हवाई अड्डे विकसित किए, जो प्रतिवर्ष 10 से 20 करोड़ वैश्विक यात्रियों की सेवा करते हैं। दुबई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे (DXB) की वार्षिक प्रत्यक्ष आय लगभग 3.8 अरब अमेरिकी डॉलर है, जबकि इसका दुबई की अर्थव्यवस्था पर कुल प्रभाव लगभग 22 से 26.7 अरब अमेरिकी डॉलर प्रतिवर्ष आँका गया है। इसी प्रकार, सिंगापुर के चांगी एयरपोर्ट समूह का वित्तीय वर्ष 2026 का राजस्व 2.4 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुँच गया। वैश्विक हवाई संपर्क के क्षेत्र में अग्रणी होने के कारण ये देश विश्वभर में उल्लेखनीय राजनीतिक और आर्थिक प्रभाव रखते हैं।

क्या भारत भी अपने विमानन क्षेत्र का उपयोग भू-अर्थशास्त्र के लाभ उठाने के लिए कर सकता है? महामारी से पहले इस क्षेत्र में 10% से अधिक की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (CAGR) को देखते हुए इसका उत्तर सकारात्मक प्रतीत होता है। हाल के वर्षों में भारत के विमानन क्षेत्र में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। वर्ष 2025 में भारत में लगभग 17.4 करोड़ मूल-गंतव्य (O-D) यात्री थे, जो विश्व में तीसरे स्थान पर है, हालांकि इनमें से लगभग 78% यात्री घरेलू यात्रा करने वाले थे (IATA, जून 2025)।

विमानन क्षेत्र—जिसमें एयरलाइंस, हवाई अड्डे, विमान रखरखाव एवं मरम्मत (MRO), ग्राउंड हैंडलिंग आदि शामिल हैं—राजस्व, करों और व्यय के माध्यम से प्रत्यक्ष रूप से सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में योगदान देता है। हालिया आकलनों के अनुसार, भारत में इस क्षेत्र ने लगभग 53.6 अरब अमेरिकी डॉलर का आर्थिक योगदान दिया तथा 77 लाख रोजगारों का समर्थन किया। दिल्ली हवाई अड्डा वर्ष 2030 तक अपनी क्षमता बढ़ाकर 10 करोड़ यात्रियों तक पहुँचाने का लक्ष्य रखता है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या भारत दुबई या सिंगापुर जैसे मॉडल को दोहरा सकता है?

दुबई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा (DXB) इस बात का उत्कृष्ट उदाहरण है कि दूरदृष्टि और रणनीति के माध्यम से किस प्रकार एक कमजोरी को ताकत में बदला जा सकता है। एक रेगिस्तान को अंतरराष्ट्रीय विमानन केंद्र में परिवर्तित कर दिया गया, जहाँ से विश्व की लगभग 80% आबादी तक 8 घंटे की उड़ान के भीतर पहुँचा जा सकता है। सरकारी स्वामित्व वाली एमिरेट्स एयरलाइन ने सैकड़ों ऐसे द्वितीयक शहरों को वैश्विक संपर्क प्रदान किया, जहाँ पहले सीधी अंतरराष्ट्रीय उड़ानें उपलब्ध नहीं थीं। संयुक्त अरब अमीरात ने अल-मकतूम अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के व्यापक विस्तार के माध्यम से विश्व के लिए अरबों डॉलर मूल्य की संरचनात्मक निर्भरता विकसित कर ली है।

सिंगापुर केवल 59 लाख की आबादी वाला एक नगर-राज्य है, जिसके पास न तो उल्लेखनीय प्राकृतिक संसाधन हैं और न ही बड़ा घरेलू बाजार। इसके बावजूद, वर्ष 2025 में चांगी हवाई अड्डे ने लगभग 7 करोड़ यात्रियों की सेवा की। यह केवल एक हवाई अड्डा नहीं, बल्कि लोगों, पूंजी और माल के वैश्विक प्रवाह को सुगम बनाने वाली एक विशाल मानव-निर्मित राष्ट्रीय आर्थिक संपत्ति है।

इसी प्रकार, तुर्की ने अपनी रणनीतिक भौगोलिक स्थिति का लाभ उठाते हुए इस्तांबुल हवाई अड्डे का विस्तार किया, जो आज विश्व का सबसे अधिक जुड़ा हुआ (Well-connected) हवाई अड्डा माना जाता है। इसने तुर्की को ऐसे बाजारों तक राजनीतिक और व्यावसायिक पहुँच प्रदान की, जहाँ अन्य देशों की पहुँच सीमित थी। वर्ष 2025 में इस्तांबुल हवाई अड्डे ने 8.4 करोड़ यात्रियों की सेवा की, जिनमें से 3.6 करोड़ यात्री केवल ट्रांज़िट थे और वे टर्मिनल से बाहर भी नहीं निकले। यह हवाई अड्डा 110 देशों के 309 गंतव्यों को जोड़ता है, जिनमें अफ्रीका के वे क्षेत्र भी शामिल हैं जहाँ अधिकांश पश्चिमी एयरलाइंस जाने से बचती रही हैं। इसने हीथ्रो, चार्ल्स डी गॉल, फ्रैंकफर्ट तथा अमेरिका के प्रमुख हवाई अड्डों को भी पीछे छोड़ दिया है।

वर्ष 2025 में चीन ने लगभग 1.5 अरब हवाई यात्राओं का संचालन किया और बताया जाता है कि वह अपनी बेल्ट एंड रोड पहल (Belt and Road Initiative) के तहत अंतरराष्ट्रीय विमानन क्षेत्र में भारी निवेश कर रहा है।
आज के समय में हवाई अड्डे केवल यात्रा के प्रवेश द्वार नहीं रह गए हैं, बल्कि वे ‘सॉफ्ट पावर’ और आर्थिक प्रभाव के महत्वपूर्ण साधन बन चुके हैं। बुनियादी ढांचे में निवेश, संचालन रणनीति और हवाई संपर्क का विस्तार यह तय करेगा कि वैश्विक प्रतिस्पर्धा में कौन-सा देश दूसरों से आगे निकलेगा। विश्लेषकों का मानना है कि भविष्य में वैश्विक शक्ति का निर्धारण केवल सैन्य क्षमता या राजनीतिक प्रभाव से नहीं होगा, बल्कि इस बात से भी होगा कि कौन-सा देश विशाल विमानन नेटवर्क और विश्वस्तरीय टर्मिनल विकसित कर मौजूदा विमानन केंद्रों को पीछे छोड़ने में सफल होता है।

भारत की 65-68 प्रतिशत आबादी कामकाजी आयु वर्ग में है। मजबूत आर्थिक आधार, विशाल घरेलू बाजार और राजनीतिक स्थिरता के साथ भारत निश्चित रूप से एक दशक से भी कम समय में विश्व के प्रमुख विमानन केंद्रों में शामिल होने की क्षमता रखता है। भौगोलिक स्थिति के कारण दक्षिण एशिया में भारत का केंद्रीय स्थान है और वह पूर्व तथा पश्चिम के बीच एक सेतु की भूमिका निभा सकता है। भारत की निकटता मध्य-पूर्व, यूरोप, अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया से है। प्रवासी भारतीयों से आने वाले धन और खाड़ी देशों के साथ व्यापारिक संबंध स्वाभाविक रूप से हवाई संपर्क की मांग को बढ़ाते हैं। दीर्घकालिक अनुमानों के अनुसार भारत दुनिया के शीर्ष तीन विमानन बाजारों में शामिल हो सकता है। रिपोर्टों के अनुसार दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु को ऐसे ट्रांजिट हब के रूप में विकसित करने की योजनाएं चल रही हैं, जो खाड़ी देशों की विमानन कंपनियों को चुनौती दे सकें।

भारत में हवाई अड्डों की संख्या 2014 में 74 से बढ़कर 2024 तक 159 हो गई है। उड़ान (UDAN) योजना के तहत सैकड़ों क्षेत्रीय मार्ग शुरू किए गए हैं, जिनके माध्यम से 90 से अधिक हवाई अड्डों को लगभग 600 मार्गों से जोड़ा गया है। राष्ट्रीय नागरिक उड्डयन नीति (NCAP) 2016 का लक्ष्य यात्रियों और माल परिवहन में बड़े पैमाने पर वृद्धि करना है। पीआईबी के अनुसार, वंचित और दूरदराज के क्षेत्रों में हवाई संपर्क को बढ़ावा देने के लिए ₹4,023.37 करोड़ की व्यवहार्यता अंतर वित्त पोषण (VGF) राशि वितरित की गई। इसके सकारात्मक प्रभाव पर्यटन, स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच और व्यापार में स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं।

अडानी समूह जैसे निजी क्षेत्र के खिलाड़ी बड़े पूंजी निवेश के साथ कई हवाई अड्डा परियोजनाओं में शामिल हुए हैं। जीएमआर समूह दिल्ली और हैदराबाद हवाई अड्डों के विस्तार, एयरो-सिटी और कार्गो टर्मिनल के विकास में बड़े निवेश कर रहा है। मध्यम वर्ग के विस्तार और बढ़ती आय के कारण कम लागत वाली उड़ानों की मांग लगातार बनी हुई है, जिससे विमानन बाजार के विकास की संभावनाएं मजबूत हैं।

हालांकि, दुबई या सिंगापुर जैसे वैश्विक विमानन केंद्रों से प्रतिस्पर्धा करने के लिए भारत को इस क्षेत्र की कुछ संरचनात्मक चुनौतियों का समाधान करना होगा। पहला, वर्तमान व्यवस्था घरेलू पॉइंट-टू-पॉइंट यातायात को संभालने में ही पर्याप्त दबाव महसूस करती है, जबकि ट्रांजिट यातायात अभी सीमित है। इसका बड़ा हिस्सा (लगभग 85 प्रतिशत) अभी भी खाड़ी देशों के विमानन केंद्रों से होकर गुजरता है। दूसरा, सेवा गुणवत्ता, आव्रजन और सुरक्षा प्रक्रियाओं में देरी, कुशल मानव संसाधन की कमी, विदेशों पर निर्भर एमआरओ (Maintenance, Repair and Overhaul) सेवाएं और ऊंची लागत प्रतिस्पर्धा को कठिन बनाती हैं। तीसरा, लाभ की अनिश्चितता, ईंधन की कीमतों में उतार-चढ़ाव, नियामकीय समस्याएं और इंडिगो तथा एयर इंडिया जैसे कुछ बड़े ऑपरेटरों का प्रभुत्व विमानन क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को जटिल बनाते हैं। इसके अलावा स्वामित्व नियमों, कर व्यवस्था, द्विपक्षीय समझौतों और केंद्र-राज्य समन्वय से जुड़ी नीतिगत अनिश्चितताएं भी एक चुनौती हैं।

मध्य-पूर्व में जारी संघर्ष ने दुबई की सुरक्षित और अजेय विमानन केंद्र के रूप में बनी छवि को प्रभावित किया है। भारत एक शांतिप्रिय देश है और आतंकवाद के प्रति उसकी शून्य सहनशीलता की नीति उसे एक विश्वसनीय अंतरराष्ट्रीय विमानन ट्रांजिट केंद्र के रूप में स्थापित कर सकती है। भारत को इस अवसर का उपयोग करते हुए विश्वस्तरीय विमानन केंद्र विकसित करने के मिशन पर आगे बढ़ना चाहिए।

तेज और सुगम कनेक्टिविटी, त्वरित प्रक्रियाएं, उच्चस्तरीय सुविधाएं और विशाल कार्गो प्रबंधन क्षमता के लिए उत्कृष्ट बुनियादी ढांचा आवश्यक है। उदार द्विपक्षीय समझौतों, व्यापार सुगमता, कर प्रोत्साहनों और पर्यटन, वित्त, व्यापार तथा रियल एस्टेट जैसे व्यापक क्षेत्रों के साथ बेहतर एकीकरण के लिए खुली नीतियां अपनानी होंगी। मार्ग विस्तार की रणनीति को आक्रामक रूप से आगे बढ़ाने की आवश्यकता है।

निस्संदेह, हवाई अड्डों को आर्थिक विकास के इंजन और वैश्विक भू-राजनीतिक प्रभाव के साधन के रूप में विकसित करने की दूरदर्शी सोच ही भारत का मार्गदर्शन कर सकती है। भारत यह कर सकता है।

(लेखक छत्तीसगढ़ के पूर्व अतिरिक्त मुख्य सचिव हैं)

SUKANT RAJPUT

जन्म 13 अगस्त 1973 को राजधानी रायपुर में हुआ। मेरी जड़ें उत्तर प्रदेश ग्राम चौरंग, कुंडा जिला प्रतापगढ़ से जुडी हैं। मुझे शिक्षक माता-पिता, विख्यात सर्प विशेषज्ञ डॉ अर्जुन सिंह रंगीला का पौत्र और छत्तीसगढ़ राजिम-धमतरी क्षेत्र के स्वतंत्रता सेनानी ठाकुर राम पाल सिंह बिसेन का नाती होने का गौरव प्राप्त है। स्कूल से लेकर कॉलेज MA(PUB.ADD.) BJMC तक की शिक्षा रायपुर में ही ग्रहण किया। एनसीसी एयर विंग से 'ए' 'बी' और 'सी' सर्टिफिकेट तीन नेशनल कैंप का तत्कालीन मध्य प्रदेश में रायपुर, भोपाल और इंदौर का नेतृत्व किया। रायपुर थ्री एमपी (अब सीजी) एयर स्क्वॉर्डर्न से सर्वाधिक ग्लाइडिंग फ़्लाइंग की शॉर्टिज करके 1995 में ग्लाइडर पायलट यतेंद्र सिंह राणा सर की कमान में सोलो फ़्लाइंग किया। पत्रकारिता के क्षेत्र में मातृ संसथान दैनिक हरिभूमि में वर्ष 2000 में डेस्क में विज्ञप्ति बनाने से शुरुआत हुई। लगभग 15 साल हरिभूमि, फिर इलेक्ट्रॉनिक न्यूज चैनल स्टैंडर्ड वर्ल्ड 'वाच' चैनल, पत्रिका, दबंग दुनिया, समवेत शिखर, अमनपथ और जनता से रिश्ता मिड डे अख़बार में भी विभिन्न पदों पर कार्यरत था। वर्तमान में शहर सत्ता साप्ताहिक अख़बार में बतौर प्रधान संपादक हूं।

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