मकानों में कारोबार, गली-मोहल्लों में बाजार, निगम के नियम तार-तार, आंखें खोलो सरकार…!

-खुरचन/हरिदास

अब शहर में मकानों का नक्शा देखकर यह तय करना मुश्किल है कि यह घर है या व्यापारिक प्रतिष्ठान। कहीं बैठकखाना किराना दुकान बन चुका है, कहीं गैराज में होटल खुल गया है, कहीं बरामदे में रेस्तरां चल रहा है और कहीं घर की पहली मंजिल पर बाकायदा ऑफिस। मकान के बाहर बोर्ड बदलते रहते हैं, लेकिन दीवारें वही रहती हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले उन दीवारों के भीतर परिवार रहता था, अब ग्राहक रहते हैं।
मामला दुकान तक होता तो भी गनीमत थी। शहर ने तो मकानों को अस्पताल तक बना दिया है। मकान में रहने वाला शख्स डॉक्टर है, इसलिए मकान को अस्पताल का दर्जा मिल गया। नीचे मरीजों की भीड़, ऊपर मरीजों के परिजन, एक कमरे में जांच, दूसरे में इलाज और जरूरत पड़ी तो ऑपरेशन तक। मकान के बाहर डॉक्टर का नाम चमक रहा है और भीतर मकान अपनी पहचान ढूंढ रहा है—“मैं घर हूं या अस्पताल?” उसे कोई बताने वाला नहीं।
मकान मालिक कहता है—“डॉक्टर साहब का अपना मकान है।”
जैसे अपना मकान होना ही अस्पताल चलाने का लाइसेंस हो।
किसी मकान में डॉक्टर रहता है तो वह क्लिनिक हो गया, किसी में व्यापारी रहता है तो गोदाम हो गया, किसी में पढ़ा-लिखा लड़का रहता है तो कोचिंग सेंटर खुल गया और किसी मकान मालिक को खाना बनाने का शौक हुआ तो घर होटल-रेस्तरां बन गया। शहर में अब मकान की उपयोगिता उसके नक्शे से नहीं, उसके मालिक की कल्पना और कमाई की क्षमता से तय होती है।
पहले मकान का नक्शा यह बताता था कि बैठक कहां होगी, रसोई किस तरफ होगी, कितने कमरे होंगे और परिवार कहां रहेगा। अब नक्शा शायद इस हिसाब से बनता है कि सामने कितने ग्राहक खड़े हो सकते हैं, कितनी गाड़ियां सड़क पर लग सकती हैं और कितने कमरों से महीने का कितना किराया निकलेगा।
नगर नियोजन वाले कहेंगे—“यह आवासीय क्षेत्र है।”
मकान मालिक मुस्कुराएगा—“कागज पर होगा साहब, जमीन पर तो बाजार है।”
और सच भी यही है। शहर के हर मोहल्ले में धीरे-धीरे घर की जगह बाजार घुस आया है। कोई बड़ी दुकान खोल रहा है तो कोई छोटी। कोई अस्पताल चला रहा है तो कोई क्लिनिक। कोई हॉस्टल चला रहा है तो कोई पीजी। कहीं किराना है, कहीं बेकरी, कहीं फास्ट फूड, कहीं होटल और कहीं रेस्तरां। ऐसा लगता है कि शहर के लोगों ने सामूहिक रूप से तय कर लिया है कि अब किसी मकान को सिर्फ मकान रहने देना आर्थिक अपराध है।
मकान खाली देखकर लोग बेचैन हो जाते हैं।
“इतनी जगह खाली पड़ी है!”
खाली जगह देखकर आजकल आदमी को घर नहीं, व्यापार की संभावना दिखाई देती है।
बालकनी खाली है तो बोर्ड लगा दो। बरामदा खाली है तो काउंटर लगा दो। गैराज खाली है तो दुकान बना दो। सीढ़ियों के नीचे जगह है तो सामान रख दो। सड़क के सामने थोड़ा हिस्सा बचा है तो पार्किंग बना दो। और अगर सड़क भी बची है तो उसे ग्राहकों के लिए छोड़ दो।
शहर में जगह की कमी नहीं है, बस खाली जगह को खाली छोड़ने की आदत खत्म हो गई है।
सबसे मजेदार बात यह है कि इस पूरी क्रांति में किसी ने किसी से पूछा भी नहीं। अनुमति की जरूरत किसे है? मकान अपना है, दीवार अपनी है, बोर्ड अपना है, धंधा अपना है। बस सड़क सार्वजनिक है—इसलिए उसे भी अपना मान लिया गया है।
पहले घर का दरवाजा परिवार के लोगों के लिए खुलता था। अब ग्राहक के लिए खुलता है।
पहले मोहल्ले में पड़ोसी रहते थे। अब ग्राहक रहते हैं। पहले घर में रात को सन्नाटा उतरता था। अब रेस्तरां का शटर गिरता है, हॉस्टल की बाइकें आती हैं, अस्पताल में मरीज भर्ती होते हैं और किसी मकान के बाहर डिलीवरी बॉय खड़ा मिलता है। मोहल्ला सोता नहीं, कारोबार करता है।
शहर का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यही है कि हमने मकान को कमाऊ तो बना दिया, लेकिन रहने लायक कम छोड़ दिया। हर खाली दीवार को कमाई चाहिए, हर बरामदे को कारोबार चाहिए, हर कमरे को किराया चाहिए और हर सड़क को पार्किंग चाहिए।
एक दिन शायद नगर निगम शहर का नया नक्शा बनाएगा। अधिकारी पूछेगा—“आवासीय क्षेत्र कहां है?”
कर्मचारी नक्शा उलट-पलटकर देखेगा।
“साहब, आवासीय क्षेत्र तो है।”
“कहां?”
“जहां दुकान बंद होने के बाद दुकानदार सोता है, जहां क्लिनिक बंद होने के बाद डॉक्टर सोते हैं, जहां हॉस्टल खाली होने के बाद मालिक सोता है।”
साहब चश्मा उतारकर पूछेगा—“और परिवार?”
कर्मचारी कहेगा—“परिवार? वह तो किसी ऐसे मकान की तलाश में है, जिसमें अभी तक कोई कारोबार शुरू नहीं हुआ।”
तब शायद शहर को पहली बार समझ आएगा कि हमने विकास के नाम पर क्या खो दिया।
हमारे पास मकान हैं, मगर घर कम हैं। दुकानें हैं, मगर आंगन कम हैं। अस्पताल हैं, मगर पार्किंग नहीं। रेस्तरां हैं, मगर सड़क नहीं। हॉस्टल हैं, मगर मोहल्ला नहीं।
आवासीय क्षेत्र में व्यावसायिक गतिविधियां अवैध हैं—यह बात कोई रहस्य नहीं, सब जानते हैं। मकान मालिक जानता है, पड़ोसी जानता है और नगर निगम भी जानता है। फिर भी शहर में नियमों की हालत ऐसी है कि कागज पर मकान आवासीय है और जमीन पर दुकान, होटल, क्लिनिक, गोदाम या अस्पताल। बस बोर्ड बदलने की देर है, घर का चरित्र बदल जाता है। जिस दरवाजे से कभी परिवार के लोग आते-जाते थे, वहीं अब ग्राहक, मरीज और माल ढोने वाले पहुंचते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि सड़क पर ठेला लगते ही कानून को अतिक्रमण दिखाई देता है, लेकिन मकान के भीतर कारोबार शुरू होते ही वही कानून शायद चप्पल उतारकर आराम करने चला जाता है।

  • SUKANT RAJPUT

    जन्म 13 अगस्त 1973 को राजधानी रायपुर में हुआ। मेरी जड़ें उत्तर प्रदेश ग्राम चौरंग, कुंडा जिला प्रतापगढ़ से जुडी हैं। मुझे शिक्षक माता-पिता, विख्यात सर्प विशेषज्ञ डॉ अर्जुन सिंह रंगीला का पौत्र और छत्तीसगढ़ राजिम-धमतरी क्षेत्र के स्वतंत्रता सेनानी ठाकुर राम पाल सिंह बिसेन का नाती होने का गौरव प्राप्त है। स्कूल से लेकर कॉलेज MA(PUB.ADD.) BJMC तक की शिक्षा रायपुर में ही ग्रहण किया। एनसीसी एयर विंग से 'ए' 'बी' और 'सी' सर्टिफिकेट तीन नेशनल कैंप का तत्कालीन मध्य प्रदेश में रायपुर, भोपाल और इंदौर का नेतृत्व किया। रायपुर थ्री एमपी (अब सीजी) एयर स्क्वॉर्डर्न से सर्वाधिक ग्लाइडिंग फ़्लाइंग की शॉर्टिज करके 1995 में ग्लाइडर पायलट यतेंद्र सिंह राणा सर की कमान में सोलो फ़्लाइंग किया। पत्रकारिता के क्षेत्र में मातृ संसथान दैनिक हरिभूमि में वर्ष 2000 में डेस्क में विज्ञप्ति बनाने से शुरुआत हुई। लगभग 15 साल हरिभूमि, फिर इलेक्ट्रॉनिक न्यूज चैनल स्टैंडर्ड वर्ल्ड 'वाच' चैनल, पत्रिका, दबंग दुनिया, समवेत शिखर, अमनपथ और जनता से रिश्ता मिड डे अख़बार में भी विभिन्न पदों पर कार्यरत था। वर्तमान में शहर सत्ता साप्ताहिक अख़बार में बतौर प्रधान संपादक हूं।

    Related Posts

    Weekly Column : खुरचन; स्मार्ट मीटरः बिजली आई, अंधेरा लाई…!

    द्वारा–हरिदास (Weekly Column)हमारे यहाँ स्मार्ट मीटर आए तो लगा कि बिजली व्यवस्था “स्मार्ट” होगी। आम आदमी ने सोचा, बिल कम आएगा, चोरी रुकेगी, हिसाब साफ होगा। लेकिन हुआ उल्टा। स्मार्ट…

    Continue reading
    Weekly Column khurchan : साप्ताहिक कालम ‘खुरचन’…उदंत मार्तण्ड से उदंत मार्केट तक पत्रकारिता

    -हरिदास (Weekly Column khurchan)हिन्दी पत्रकारिता के दो सौ साल पूरे हो गए। यह कम उपलब्धि नहीं है। दो सौ साल में आदमी लगभग दो से तीन बार फिर से जन्म…

    Continue reading

    Leave a Reply

    Your email address will not be published. Required fields are marked *

    ताजा खबरें

    विकास के आंकड़ों के बीच जेब क्यों हो रही ढीली

    विकास के आंकड़ों के बीच जेब क्यों हो रही ढीली

    मकानों में कारोबार, गली-मोहल्लों में बाजार, निगम के नियम तार-तार, आंखें खोलो सरकार…!

    मकानों में कारोबार, गली-मोहल्लों में बाजार, निगम के नियम तार-तार, आंखें खोलो सरकार…!

    Shaharsatta (07 Sep to 13 Sep 2026)

    Shaharsatta (07 Sep to 13 Sep 2026)

    Congress President Posted on X : कांग्रेस अध्यक्ष ने PM को कहा पीएम आउट ऑफ रीच और जुमलेबाज

    Congress President Posted on X : कांग्रेस अध्यक्ष ने PM को कहा पीएम आउट ऑफ रीच और जुमलेबाज

    Pradhan Mantri Awas Yojana : टपकती छत, सीलन भरे मिट्टी के कच्चे से पक्के मकान तक का सफर

    Pradhan Mantri Awas Yojana : टपकती छत, सीलन भरे मिट्टी के कच्चे से पक्के मकान तक का सफर

    Bhupesh Removed From Punjab : पंजाब कांग्रेस को क्यों एकजुट नहीं कर पाए भूपेश ?

    Bhupesh Removed From Punjab : पंजाब कांग्रेस को क्यों एकजुट नहीं कर पाए भूपेश ?