-हरिदास
छत्तीसगढ़ में नकली पनीर (एनालॉग) पर प्रतिबंध है, लेकिन बाजार में उसका खेल बंद नहीं हुआ। कानून अपनी फाइलों में रास्ता तलाशता रहता है और मिलावटखोर मुनाफे का हाईवे पकड़कर फर्राटे भरते हैं। गजब का कारोबार है! माल नकली, धंधा असली और मुनाफा एकदम खरा! ग्राहकों को लूटने में भी कोई मिलावट नहीं।
इन कारोबारियों ने अर्थशास्त्र का नया सिद्धांत गढ़ लिया है—माल में दम न हो, तो दाम बढ़ा दो! सस्ता बेचोगे तो ग्राहक शक करेगा, महंगा बेचोगे तो शुद्धता का प्रमाणपत्र खुद ही जारी कर देगा। अब नकली पनीर को असली साबित करने के लिए दूध की जरूरत नहीं, ऊंची कीमत ही काफी है।
वाह रे बाजार! मिलावट भी तुम्हारी, कीमत भी तुम्हारी और ग्राहक की आंखों पर बंधी पट्टी भी तुम्हारी! ग्राहक सोचता है—इतना महंगा है, जरूर असली होगा। उधर मिलावटखोर मन ही मन मुस्कराता है—वाह रे ग्राहक! तूने मेरे नकली माल को महंगा समझकर नहीं, महंगा देखकर असली मान लिया! मिलावटखोरों का अर्थशास्त्र ही निराला है—माल में मिलावट बढ़ाओ, दाम में दम बढ़ाओ; ग्राहक की जेब काटो और शुद्धता का भ्रम बेचकर ईमानदारी का तमगा भी पाओ! पहले मिलावट चीजों में होती थी, अब ग्राहक की समझ में भी मिलावट की जा रही है। पनीर में दूध हो न हो, कीमत में ईमानदारी का पूरा प्रदर्शन है। माल नकली बेचो, दाम असली वसूलो और ग्राहक को उसकी ही जेब कटने पर गुणवत्ता का भ्रम पालने दो! मिलावटखोर भी खुश और ग्राहक भी भ्रम में खुश!” माल नकली, दाम असली और ग्राहक की जेब साफ।
अब सिर्फ पनीर ही नहीं, दूध से बनी हर सफेद चीज संदेह के दायरे में है, खुद दूध भी! नकली पनीर तो जगजाहिर है, कभी दूध में मिलावट की खबर आती है, कभी मावे की खेप पकड़ी जाती है, मिठाई, मक्खन और क्रीम की गुणवत्ता पर भी सवाल उठते हैं। पनीर सफेद है, इसका अर्थ यह नहीं कि वह शुद्ध है। दूध सफेद है, इसका अर्थ यह नहीं कि वह मानकों पर खरा उतरता है। मिठाई चमकदार है, इसका अर्थ यह नहीं कि उसकी गुणवत्ता भी चमकदार है और दुकान के बाहर बड़े अक्षरों में ‘शुद्ध’ लिख देने से कोई चीज शुद्ध नहीं हो जाती !
शुद्धता का प्रमाण विज्ञापन नहीं, जांच और जवाबदेही है। भरोसा दुकानदार की मुस्कान से नहीं, उसके कारोबार की पारदर्शिता से बनता है। मिलावटखोर सिर्फ दूध में कोई पदार्थ नहीं मिलाता। वह उस मां के भरोसे में मिलावट करता है, जो बच्चे के लिए पौष्टिक भोजन खरीदती है। वह उस परिवार की खुशी में मिलावट करता है, जो त्योहार पर मिठाई लाता है। वह उस व्यवस्था की साख में मिलावट करता है, जिससे नागरिक सुरक्षा की उम्मीद करता है। इसलिए मिलावट केवल व्यापार का अपराध नहीं, जनता के विश्वास पर हमला भी है।
छत्तीसगढ़ को ऐसी व्यवस्था चाहिए, जहां प्रतिबंधित या नियमविरुद्ध उत्पादों का कारोबार करना आसान न हो। जहां नकली उत्पादों को असली बताकर बेचना महंगा पड़े। जहां बार-बार अपराध करने वालों के खिलाफ कठोर और प्रभावी कार्रवाई हो। जहां जांच रिपोर्ट और कार्रवाई के परिणाम जनता के सामने आएं। जहां उपभोक्ता की शिकायत को औपचारिकता मानकर फाइल में बंद न कर दिया जाए। क्योंकि सवाल सिर्फ पनीर का नहीं है। सवाल उस भरोसे का है, जिसके आधार पर आम आदमी अपनी मेहनत की कमाई से भोजन खरीदता है।
खाद्य विभाग के सामने संसाधनों, कर्मचारियों, जांच सुविधाओं और कानूनी प्रक्रियाओं की चुनौतियां हो सकती हैं। नमूने लेने से लेकर प्रयोगशाला की रिपोर्ट और न्यायिक कार्रवाई तक समय लगता है। यह सब वास्तविक कठिनाइयां हैं। लेकिन मिलावटखोरों की ओर से जनता को कोई रियायत नहीं मिलती। वे यह कहकर कारोबार नहीं रोकते कि जांच प्रयोगशाला में लंबित है। वे यह सोचकर नकली माल बनाना बंद नहीं करते कि विभाग के कर्मचारी छुट्टी पर हैं। उनका कारोबार चलता रहता है। जनता की थाली सजती रहती है। और हर बार उपभोक्ता ही जोखिम उठाता है।
व्यवस्था को यह तय करना होगा कि उसकी प्राथमिकता क्या है—कार्रवाई की सूचना जारी करना या मिलावट की आपूर्ति रोकना ? छापे की संख्या गिनना या दोषियों को सजा दिलाना ? नमूने लेना या बाजार को सुरक्षित बनाना ?
छापे की तस्वीर अखबार में छप जाती है। जब्त माल का आंकड़ा सुर्खी बन जाता है। मगर जनता को यह जानने में भी दिलचस्पी है कि उस मामले का अंतिम परिणाम क्या निकला। कितने मामलों में दोष साबित हुआ? कितनों को दंड मिला? कितने कारोबारियों ने दोबारा वही अपराध किया? कितनी आपूर्ति शृंखलाओं को तोड़ा गया? कार्रवाई का असली पैमाना छापे के दिन की सुर्खी नहीं, उसके बाद बाजार में आया बदलाव है।
वरन छापे पड़ते रहेंगे, माल पकड़ा जाता रहेगा, कार्रवाई होती रहेगी और खबरें छपती रहेंगी। जनता हर बार यही सोचेगी कि अब मिलावटखोरों का खेल खत्म! मगर कुछ दिन गुजरते ही दुकान फिर सज जाएगी, धंधा फिर चल पड़ेगा और मिलावट एक बार फिर बाजार में फर्राटा भरने लगेगी। यह चक्र यूं ही चलता रहेगा… जब तक कार्रवाई का डर मिलावटखोरों के मुनाफे पर भारी नहीं पड़ता..!







