
संजय का कहना है कि वे अभिनय को अपने जीवन का मकसद मानते हैं। ईश्वर ने मुझे कलाकारी के लिए ही इस धरती पर भेजा है,वे कहते हैं। अभिनय की शुरुआत उन्होंने 1996-97 में गुरुदेव संजय मैथिल की नाट्यशाला से की। उनका पहला नाटक ‘बड़े भाई साहब’ रहा, जिसे खूब सराहना मिली। इसके बाद उन्होंने इप्टा और कई नाट्य दलों के साथ काम करते हुए फिल्मों की ओर रुख किया।

2001 में उनकी पहली छत्तीसगढ़ी फिल्म बनिहार आई। इसके बाद भोला छत्तीसगढ़िया, तोर मया के मारे, मया, महू दीवाना तहुं दीवानी और भूलन द मेज (राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता) जैसी फिल्मों ने उन्हें पहचान दिलाई। 2025 में भी उनकी सुकवा, जवानी जिंदाबाद, मोर छइयां भुइंया 3, और जित्तू की दुल्हनिया रिलीज हो चुकी हैं।

मुंबई सफर आसान नहीं रहा। वे बताते हैं,ठहरने के लिए जगह नहीं थी, पैसे खत्म होते तो रायपुर लौट आता।भोजपुरी फिल्म निरहुआ हिंदुस्तानी ने मुझे वहां टिकने का सहारा दिया। वे मानते हैं कि मुंबई में टैलेंट से ज्यादा लुक, अंग्रेजी और नेटवर्किंग देखी जाती है।

संजय ने कास्टिंग डायरेक्टरों पर भी सवाल उठाए, अगर कास्टिंग डायरेक्टर खुद एक्टर हो तो अच्छे कलाकारों का भला नहीं हो सकता।छत्तीसगढ़ी सिनेमा के सीमित दायरे पर वे कहते हैं, यहां सभी लोग अपनी ही फिल्में नहीं देखते, इसलिए कलाकारों को वह स्टारडम नहीं मिल पाता।







