प्रधान संपादक/शहर सत्ता – सुकान्त राजपूत

एक लेख में कहा गया है, बैठना नए तरह का धूम्रपान है। उन दिनों, जब मैं संपादक नहीं हुआ करता था, तब महज चंद रुपये दिहाड़ी का पत्रकार सिर्फ था। साथी सहचर भी थे लेकिन ज्यादातर मेरी सिगरेट के मुफ्त तलबगार थे।(Editorial by Sukant Rajput) पांच रुपट्टी का तंबाखु पाउच खाने वाले भी मेरी 20 रूपये प्रति नग वाली श्वेत डंडिका पर डाका मारने ललहाते थे। बजट का नुकसान और बुराइयां भी खूब झेला। खैर, कुछ इसे आधुनिक स्टाइल मानते हैं और कुछ सोचते हैं “किसे परवाह है। याद रखिए इसका संबंध दूसरों की राय से नहीं, बल्कि खुद से जुड़ा है। दुर्भाग्यवश, वे यह नहीं समझते कि वे बैठने की लत के चरम पर पहुंच चुके हैं!
लत, व्यसन और जानलेवा मोड़ तक पहुंच चुके सिगरेट का छल्ला उड़ाने और तंबाखू पाउच की गाढ़ी लाल पीक किसी पिट वाइपर की तरह थूकने वाले बेवकूफों से मेरी हमदर्दी है। लेकिन साथ ही साथ हेल्थ डिपार्टमेंट और फ़ूड एंड ड्रग कंट्रोलर्स की खानापूर्ति वाली कार्रवाई से ज्यादा नाराजगी है। छत्तीसगढ़ में सिगरेट, गुटखा, तंबाखु खाने वालों को जितना नुकसान उनका नशा नहीं कर रहा उससे कहीं ज्यादा क्षति नकली, घटिया और स्तरहीन उत्पाद से हो रही है।
प्रतिबंध के बावजूद नकली गुटखा फैक्ट्रियां, डुप्लीकेट पाउच प्रोडक्ट और भाटापारा-तिल्दा ब्रांड सिगरेट धड़ल्ले से करोड़ों का कारोबार बन गए हैं। आश्चर्य तो तब होता है जब जिम्मेदार जिला प्रशासन, खाद्य विभाग और अन्य इदारे खामोश बैठे हैं। नकली पनीर की फैक्ट्री और निकोटिन प्रोडक्ट एक सामान जानलेवा खतरा महसूस होते हैं। बावजूद इसके ऐसे उत्पाद और उत्पादनकर्ताओं की मुश्कें अब तक क्यों नहीं कसी गईं यह अन्वेषण का विषय है।
हर साल 31 मई को मनाया जाने वाला ‘वर्ल्ड नो टोबैको डे’ तंबाकू के उपयोग के खतरों के बारे में जनता को जागरूक करता है। मैं भी खुद को रोजाना तंबाकू के उपयोग के खतरों के बारे में सजग करते रहता हूं। लेकिन किसी सचमुच की जाहिल कौम की तरह अब भी पढ़ा लिखा गधा ही बना हुआ हूं। इसे शुरू करना आसान है लेकिन छोड़ना मुश्किल। इस आदत को छोड़ दें, नहीं तो वह दिन दूर नहीं जब ‘एल्कोहलिक एनोनिमस’ की तरह पढ़े-लिखे गधों का संगठन भी कुकुरमुत्तों की तरह बढ़ जायेंगे।





