गीत लेखन और साहित्यकार का दर्जा हासिल छालीवुड का यह शख्स एक धर्म विशेष को भद्दी और अश्लील गालियां अपने फेसबुक अकाउंट से देते कुख्यात हो गया है। उसकी सड़क छाप गालियां और टपोरियों जैसी टिप्पणी से प्रशंसक भी खफा हैं और इंडस्ट्रीज के सम्मानित नाम वाले भी।

किसी अन्य धर्म, संस्कार और परंपरा को मां की गालियां देने वाले चर्चित गीतकार और स्वयं को साहित्यकार कहने वाले नवल दास मानीकपुरी हैं। चौंकिए नहीं ऐसे ही एक और बदजुबान शख्सियतों में शुमार हैं छालीवुड के कथित कामयाब फिल्म निर्माता हैं मोहित साहू। ‘एन माही फिल्म’ प्रोडक्शन के कर्ता-धर्ता के खाते में सफल फ़िल्में भी बनीं हैं। ऐसे में छत्तीसगढ़ की संस्कृति, सम्मान, परिधान और परंपरा के लिए बड़ी बड़ी बातें करने वाले ही अगर महज उनकी फिल्म नहीं चली तो दर्शकों से बदजुबानी करने लगे तो फिर छत्तीसगढ़ की मिट्टी की खुशबू, सादगी और सांस्कृतिक विरासत कौन सम्हालेगा ?

छत्तीसगढ़ी सिनेमा के दर्शकों, प्रशंसकों के कान में ज़हर घोलते शब्द और साहित्यकार की ‘टपोरी’ भाषा से आज छालीवुड एक शर्मनाक विवाद में है। चर्चित गीतकार और स्वयं को साहित्यकार कहने वाले नवल दास मानीकपुरी पर सोशल मीडिया पर अशोभनीय भाषा और एक विशेष समुदाय के खिलाफ भद्दी गालियों का प्रयोग करने का गंभीर आरोप लग रहा है।

“जब शब्द ही हथियार हैं, तो ज़हर क्यों बोते हो?”
नवल दास, जिन्होंने कई हिट एल्बम और फिल्मों के गीत लिखे हैं, वे अचानक सोशल मीडिया पर एक टपोरी भाषा शैली में उतर आए। न केवल आम दर्शकों बल्कि समाज के एक बड़े हिस्से में इससे नाराजगी फैल गई है। लोग सवाल कर रहे हैं – क्या अब छत्तीसगढ़ी साहित्य और सिनेमा के नाम पर गाली-गलौच बिकेगा?
फिल्म पिट गई तो भड़ास दर्शकों पर निकाला
कुछ महीने पहले बड़े प्रोडक्शन हाउस में शामिल ‘एन माही फिल्म’ की छत्तीसगढ़ी फिल्म रिलीज हुई। जब फिल्म नहीं चली, तो निर्माता ने खुलेआम दर्शकों को गालियाँ दीं, धमकियाँ दीं। कुछ पोस्ट डिलीट कर दिए गए, लेकिन कई अभी भी सोशल मीडिया पर मौजूद हैं। मामला महज इतना है कि किसी दर्शक और यूट्यूबर ने सोशल मिडिया में इस प्रोडक्शन की एक फिल्म के बुरी तरह असफलता पर सामान्य टिप्पणी किया था बस फिर क्या था फिल्म निर्माता मोहित साहू ने सोशल मिडिया को ही सड़क छाप गालियों का गुलिस्तां बना डाला था।

जरूरत है सफाई की, सिर्फ सिनेमा नहीं सोच भी साफ होनी चाहिए। अब वक्त आ गया है कि छत्तीसगढ़ी फ़िल्म जगत खुद आत्ममंथन करे। अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर अभद्रता को बढ़ावा देना बंद करें और जो कलाकार अपने शब्दों से समाज को दिशा देने की ताकत रखते हैं, उन्हें अपनी जुबान का सम्मान आइंदा के लिए रखना होगा।





