0 झूमाझटकी के दौरान खतरे में थी मासूमियत, प्रदेश कांग्रेस की आधिकारिक सोशल मीडिया टीम ने इन मासूमों की तस्वीरें प्रचार सामग्री की तरह साझा कर दीं
पुरन किरी/रायपुर
शहर सत्ता। Congress Gherao 0f CM Residence In CG : किसी ने ठीक ही कहा है, “कुर्सी की भूख में जब मासूमियत की सांसें घुटने लगें, तब समझिए राजनीति ने अपनी आत्मा बेच दी है!” छत्तीसगढ़ की राजनीति में शनिवार को एक ऐसा दृश्य देखने को मिला। विपक्ष में बैठी कांग्रेस मुख्यमंत्री निवास घेराव के लिए सड़क पर उतरी, लेकिन इस विरोध प्रदर्शन में राजनीति ने सारी हदें पार कर दीं। प्रदर्शन में मासूम बच्चियों को “नन्हीं परियाँ” बनाकर सामने लाया गया और कांग्रेस की आधिकारिक सोशल मीडिया टीम ने इन मासूमों की तस्वीरें प्रचार सामग्री की तरह साझा कर दीं।
कांग्रेस के आंदोलन के दौरान राजधानी रायपुर की सड़कों पर टाटा एस गाड़ी में 7-8 साल की मासूम बच्चियों को ठूंस-ठूंसकर लाया गया—वो भी 45 डिग्री सेल्सियस की झुलसाती गर्मी में! मालवाहक वाहन में लड़कर नाबालिग बच्चियों को यूं किसी तरह घेराव या प्रदर्शन में लाना कितना क़ानूनी है यह शायद पीसीसी चीफ नहीं जानते लेकिन अब तक पुलिस क्या एक्शन लेगी इसकी प्रतीक्षा है।

मासूमियत की आंच पर सियासी रोटी
राजनीतिक गलियारों में यह सवाल जोर पकड़ चुका है—क्या विरोध की राजनीति अब इतनी गिर चुकी है कि उसे मासूम कंधों का सहारा लेना पड़ रहा है? सियासत में अपनी रोटी सेंकने के लिए जात, धर्म, आरोपों के बाद अब मासूमों को भी सियासी दल सड़कों पर घसीटने से बाज नहीं आ रहे।
दीपक बैज खिंचवाते रहे बच्चों संग फोटो
प्रदेश कांग्रेस के जिन भी नेताओं ने मासूम बच्चों को सीएम हॉउस घेराव के लिए लेकर आये थे उन पर कार्रवाई हो सकती है। प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज खुद उन बच्चियों के साथ फोटो खिंचवाते नजर आए, जिनकी सुरक्षा और सेहत पर प्रदर्शन की आपाधापी के दौरान गंभीर खतरा मंडरा रहा था। सवाल यह उठता है कि, क्या पीसीसी चीफ दीपक बैज को यह तस्वीर ‘लोकतंत्र की जीत’ लगी? क्या कांग्रेस प्रदर्शन में आये बच्चों की सुरक्षा का पुख्ता इंतजाम किया था। या यह तस्वीर आने वाली पीढ़ियों को शर्मिंदा करने वाला दस्तावेज़ बनती बनती रह गई ?

प्रदर्शन और बलों के बीच था खतरा
धरना प्रदर्शन के दौरान पुलिस और कांग्रेस कार्यकर्ताओं के बीच जमकर धक्का-मुक्की हुई। अपनी सियासत चमकाने के लिए कई पार्टी नेता बच्चों को लेकर वहां पहुँच गए थे जहां प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच जोर-आजमाइश चल रही थी। अगर गलती से भी सीएम हॉउस घेराव के वक्त मामला उग्र रूप धारण कर लेता या फिर कोई मासूम भीड़ की चपेट में आ जाता तो अनहोनी से इंकार नहीं किया जा सकता था। अगर ऐसा होता तो इसका जिम्मेदार कौन होता?
सियासी दलों को करना होगा परहेज
यह सिर्फ एक राजनीतिक मुद्दा नहीं, यह सामाजिक चेतना का सवाल है। क्या हम इतने संवेदनहीन हो चुके हैं कि अब बच्चों को भी ‘राजनीतिक प्रदर्शन और आंदोलनों की भीड़’ में घसीटने लगे हैं। सियासी दलों को फिर चाहे वो बीजेपी हो, कांग्रेस या फिर कोई अन्य दल मासूम बच्चों को अपनी सस्ती राजनीती के लिए उपयोग करने से गुरेज-परहेज करना होगा।

BY POORAN KIRI





