छत्तीसगढ़ी फिल्म इंडस्ट्री की अंदरूनी सच्चाई; मेहनत किसी की, नाम और पैसा किसी और का

शहर सत्ता/रायपुर। छत्तीसगढ़ी फिल्म इंडस्ट्री के चंद लोगों के लिए एक कहावत फिट बैठती है… गधे खीर खा रहे। फिल्म इंडस्ट्री की एक कड़वी सच्चाई सामने आ रही है। जिसमें फिल्म डायरेक्शन, क्रिएटिव डायरेक्टर, एसोसिएट डायरेक्टर, एक्शन डायरेक्टर, एडिटर, लिरिक्स राइटर जैसे फिल्म में जान डालने वाले किरदारों की मेहनत को अपना बताकर तारीफ और अवार्ड जुटाने वाले नाकाबिलों की अच्छी-खासी तादात हो गई है। शहर सत्ता के कला समीक्षक ने ऐसे नकली चेहरों को बेनकाब करने वाली हैरतअंगेज़ खबर का पर्दाफाश किया है। बताते हैं कि अपनी तरक्की के लिए नहीं, इंडस्ट्रीज का स्याह चेहरों की इस करतूत को अंदरूनी अव्यवस्था, कलाकारों के शोषण और गलत क्रेडिट सिस्टम से शाह मिल रही है। शहर सत्ता की खबर को पुख्ता करते हैं रायपुर के अनुभवी साउंड इंजीनियर और बैकग्राउंड म्यूजिक प्रोड्यूसर आशीष रॉबिन्सन। बता दें कि रॉबिन्सन पिछले 20 वर्षों से देशभर में म्यूजिक इंडस्ट्री से जुड़े रहे हैं और 2018 से छत्तीसगढ़ में सक्रिय हैं।

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आशीष का कहना है, “यहाँ पोस्ट-प्रोडक्शन पूरी तरह अव्यवस्थित है। कलाकारों को न सम्मान मिलता है, न समय पर मेहनताना। तुर्रा यह कि कई दफे तो दूसरों की मेहनत को खुद की बताकर उसमें अपना नाम डाला जाता है। कई बार तो 1 लाख के प्रोजेक्ट का पेमेंट 5-6 महीने तक टुकड़ों में दिया जाता है।” वे आगे बताते हैं, “₹20,000 से ₹1.5 लाख के बजट में पूरी फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर एक हफ्ते में माँगा जाता है। और ऊपर से कहा जाता है, जुगाड़ हो गया है!”

 

रॉबिन्सन के मुताबिक उन्होंने ‘तही मोर सोना’, ‘गांव के जीरो शेर मा हीरो’, ‘कुरुक्षेत्र’, ‘रुद्र’, ‘रक्षणम’, ‘मोह अउ माया’ जैसी फिल्मों पर काम किया है।छत्तीसगढ़ी फ़िल्म ‘जानकी’ और ‘बली’ के मोशन पोस्टर के लिए म्यूजिक भी बनाया, लेकिन उन्हें ना पैसे मिले ना क्रेडिट (नाम ) दिया गया। उनकी मेहनत का सारा श्रेय भी प्रोडक्शन ने किसी और को दे दिया।

 

इस स्थिति को और गंभीर बनाता है इंडस्ट्री का एक और अनोखा चलन,जो मेहनत करने वालों को चौंककर रख देगा। फिल्म को डायरेक्ट करता कोई और है मगर नाम प्रोड्यूसर लाने वाले के खाते में डाल दिया जाता है। कई फिल्मों में असली डायरेक्टर वो होता है जो शूटिंग, प्लानिंग और टीम को संभालता है, लेकिन स्क्रीन पर डायरेक्टर का नाम उसी व्यक्ति का होता है जो फाइनेंसर या प्रोड्यूसर खोजकर ले आता है। इससे फिल्म निर्माण की प्रक्रिया और क्रिएटिव सम्मान दोनों का ही बेहद घटिया तरीके से इंडस्ट्रीज के बनावटी और जुगाड़ू टाइप लोग मखौल उड़ा रहे हैं।

 

काम किसी का नाम और अवॉर्ड किसी को…

सिस्टम से व्यथित आशिष का मानना है कि अब वक्त आ गया है कि कलाकार सिर्फ भावुक नहीं, प्रोफेशनल बनें। अपने हक के लिए खड़े रहें,” वे सलाह देते हैं। निष्कर्ष यही है; जब तक इंडस्ट्री के लोग खुद एकजुट होकर सिस्टम को सुधारने का बीड़ा नहीं उठाएंगे, तब तक बदलाव मुश्किल है। सुधार की शुरुआत हमें खुद करनी होगी।

 

आगामी फिल्म ‘जानकी’ और बलि है इसका उदाहरण

छॉलीवुड फिल्म इंडस्ट्रीज की कड़वी हकीकत का एक नहीं दो नमूना(उदाहरण)है आने वाली फिल्म ‘जानकी’ और ‘बलि।’ इन दोनों ही फिल्मों में ‘मोशन पोस्टर’ के लिए म्यूजिक देने वाले की मेहनत को नजरअंदाज कर किसी दूसरे को उसका श्रेय और नाम दे दिया गया है। इसका पुख्ता साबुत है दोनों ही फिल्मों का टीजर जिसमें मेहनत थी आशीष रॉबिन्सन की और नाम दर्शाया गया है मनोहर यादव का। छालीवुड में चल रहे इस अनूठे शोषण का एक और दुखदायी पहलु है कि आशीष को नाम तो दूर अब तक उसका मेहनताना ही नहीं मिला है।

 

 

बली फ़िल्म के निर्देशक का कहना हैं की पुरे म्यूजिक का 20% ही रखा बाकि कही और से म्यूजिक करवाया गया है। रही बात पैसो की तो मैं बात करता हूं देखता हूं कि क्या और कितना देना हैं। उनको हम दे देंगे, लेकिन उनकी मेहनत के बदले दूसरे के नाम को लेकर उन्होंने कोई टिपण्णी नहीं की।

pooran kiri

जन्म तारीख 9 जनवरी 1980 को चारामा जिला कांकेर में हुआ। छत्तीसगढ़ी फिल्मों से लेकर बॉलीवुड और कई चैनलों में अभिनय कर चुके हैं। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया स्टैंडर्ड वर्ल्ड वाच न्यूज चैनल में सीनियर क्रिएटिव हेड समेत वीडियो एडिटर भी रहे। वर्तमान में शहर सत्ता साप्ताहिक अख़बार में बतौर कला समीक्षक कार्यरत है और सफल अभिनेता भी हैं। Actor, author, journalist

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