sukantrajput Archives - शहर सत्ता https://shaharsatta.com/tag/sukantrajput/ Tue, 17 Jun 2025 11:19:13 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.9.4 CHHOLLYWOOD:लाल साया, माटी की पुकार बस्तर की जमीनी सच्चाई अब बड़े पर्दे पर, आत्मसमर्पित नक्सलियों की जीवंत भूमिका में देखिए ‘माटी’ https://shaharsatta.com/2025/06/17/chhollywood-lal-saya-maati-ki-pukaar-bastars-ground-reality-now-on-the-big-screen-watch-maati-in-the-live-role-of-surrendered-naxalites/ https://shaharsatta.com/2025/06/17/chhollywood-lal-saya-maati-ki-pukaar-bastars-ground-reality-now-on-the-big-screen-watch-maati-in-the-live-role-of-surrendered-naxalites/#respond Tue, 17 Jun 2025 11:18:48 +0000 https://shaharsatta.com/?p=2662 शहर सत्ता/रायपुर/बस्तर।(CHHOLLYWOOD) चार दशकों से बस्तर की धरती पर फैले वामपंथी उग्रवाद, लाल आतंक और आम बस्तरिया की अनकही पीड़ा को अब सिनेमा का आईना मिल गया है। ‘माटी’ एक…

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शहर सत्ता/रायपुर/बस्तर।(CHHOLLYWOOD) चार दशकों से बस्तर की धरती पर फैले वामपंथी उग्रवाद, लाल आतंक और आम बस्तरिया की अनकही पीड़ा को अब सिनेमा का आईना मिल गया है। ‘माटी’ एक ऐसी छत्तीसगढ़ी फिल्म है जो न सिर्फ़ सिनेमाई अनुभव देती है, बल्कि बस्तर की आत्मा को पर्दे पर जीवित करती है। निर्देशक अविनाश प्रसाद और निर्माता सम्पत झा की प्रस्तुति ‘माटी’ सिर्फ़ एक कहानी नहीं, बल्कि वास्तविक अनुभवों से बुनी गई चेतना की आवाज़ है। इस फिल्म की सबसे खास बात है कि इसमें अभिनेताओं के साथ-साथ वास्तव में आत्मसमर्पण कर चुके नक्सलियों ने भी अपने किरदार निभाए हैं ,यानी वे अपनी ही कहानी को अभिनय के जरिए कह रहे हैं।

कामरेड भीमा,उर्मिला की कहानी

फिल्म की कहानी बस्तर के दिल से निकली है। यहां नायक हैं कामरेड भीमा,(CHHOLLYWOOD) जो कभी बंदूक उठाने को मजबूर हुए और अब सवालों से जूझते हैं। वहीं उर्मिला, गांव की एक बेटी है, जो संघर्ष और उम्मीद का प्रतीक बनकर सामने आती है। दोनों के नजरिए से दिखाया गया बस्तर एक नई सोच, नई दृष्टि और भीतर से जली हुई धरती का सच बयान करता है।बस्तर को दशकों तक बाहरी नज़रिये से देखा गया, लेकिन ‘माटी’ उसे भीतर से महसूस करने का मौका देती है। फिल्म में जल-जंगल-ज़मीन, विश्वास, धोखा, भय, और लोकतंत्र की खामोश जंग को बेहद संजीदगी और संवेदनशीलता से पेश किया गया है। यह फिल्म नक्सलवाद और लोकतंत्र के बीच की उस खामोश लड़ाई को उजागर करती है, जो बंदूक की गोली और बैलेट बॉक्स के बीच सिसकती रही है।

संघर्ष का जीवंत चित्रण

छत्तीसगढ़ी फिल्म माटी को बस्तर के वास्तविक इलाकों में शूट किया गया है, और इसमें लोक संस्कृति, बोली, ग्रामीण जीवन और संघर्ष का जीवंत चित्रण देखने को मिलेगा।’माटी’ 31 अक्टूबर 2025 से छत्तीसगढ़ के सभी सिनेमाघरों में रिलीज हो रही है।(CHHOLLYWOOD)\यह फिल्म उनके लिए है जो बस्तर को समझना चाहते हैं ,और उनके लिए भी, जो यह समझ चुके हैं कि परिवर्तन सिर्फ़ बंदूक से नहीं, माटी से आता है।

तो इस बार बस्तर को देखिए बाहरी नजरों से नहीं, बल्कि उर्मिला और भीमा की आंखों से छत्तीसगढ़ी फिल्म ‘माटी। ये फिल्म नहीं, आंदोलन है… माटी की आवाज़ है।

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Editorial by Sukant Rajput : बेवकूफों से हमदर्दी https://shaharsatta.com/2025/05/31/editorial-by-sukant-rajput-sympathy-with-idiots/ https://shaharsatta.com/2025/05/31/editorial-by-sukant-rajput-sympathy-with-idiots/#respond Sat, 31 May 2025 16:55:12 +0000 https://shaharsatta.com/?p=2548 प्रधान संपादक/शहर सत्ता – सुकान्त राजपूत एक लेख में कहा गया है, बैठना नए तरह का धूम्रपान है। उन दिनों, जब मैं संपादक नहीं हुआ करता था, तब महज चंद…

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प्रधान संपादक/शहर सत्ता – सुकान्त राजपूत

Sukant Rajput (Editor in Chief)

एक लेख में कहा गया है, बैठना नए तरह का धूम्रपान है। उन दिनों, जब मैं संपादक नहीं हुआ करता था, तब महज चंद रुपये दिहाड़ी का पत्रकार सिर्फ था। साथी सहचर भी थे लेकिन ज्यादातर मेरी सिगरेट के मुफ्त तलबगार थे।(Editorial by Sukant Rajput) पांच रुपट्टी का तंबाखु पाउच खाने वाले भी मेरी 20 रूपये प्रति नग वाली श्वेत डंडिका पर डाका मारने ललहाते थे। बजट का नुकसान और बुराइयां भी खूब झेला। खैर, कुछ इसे आधुनिक स्टाइल मानते हैं और कुछ सोचते हैं “किसे परवाह है। याद रखिए इसका संबंध दूसरों की राय से नहीं, बल्कि खुद से जुड़ा है। दुर्भाग्यवश, वे यह नहीं समझते कि वे बैठने की लत के चरम पर पहुंच चुके हैं!

लत, व्यसन और जानलेवा मोड़ तक पहुंच चुके सिगरेट का छल्ला उड़ाने और तंबाखू पाउच की गाढ़ी लाल पीक किसी पिट वाइपर की तरह थूकने वाले बेवकूफों से मेरी हमदर्दी है। लेकिन साथ ही साथ हेल्थ डिपार्टमेंट और फ़ूड एंड ड्रग कंट्रोलर्स की खानापूर्ति वाली कार्रवाई से ज्यादा नाराजगी है। छत्तीसगढ़ में सिगरेट, गुटखा, तंबाखु खाने वालों को जितना नुकसान उनका नशा नहीं कर रहा उससे कहीं ज्यादा क्षति नकली, घटिया और स्तरहीन उत्पाद से हो रही है।

प्रतिबंध के बावजूद नकली गुटखा फैक्ट्रियां, डुप्लीकेट पाउच प्रोडक्ट और भाटापारा-तिल्दा ब्रांड सिगरेट धड़ल्ले से करोड़ों का कारोबार बन गए हैं। आश्चर्य तो तब होता है जब जिम्मेदार जिला प्रशासन, खाद्य विभाग और अन्य इदारे खामोश बैठे हैं। नकली पनीर की फैक्ट्री और निकोटिन प्रोडक्ट एक सामान जानलेवा खतरा महसूस होते हैं। बावजूद इसके ऐसे उत्पाद और उत्पादनकर्ताओं की मुश्कें अब तक क्यों नहीं कसी गईं यह अन्वेषण का विषय है।

हर साल 31 मई को मनाया जाने वाला ‘वर्ल्ड नो टोबैको डे’ तंबाकू के उपयोग के खतरों के बारे में जनता को जागरूक करता है। मैं भी खुद को रोजाना तंबाकू के उपयोग के खतरों के बारे में सजग करते रहता हूं। लेकिन किसी सचमुच की जाहिल कौम की तरह अब भी पढ़ा लिखा गधा ही बना हुआ हूं। इसे शुरू करना आसान है लेकिन छोड़ना मुश्किल। इस आदत को छोड़ दें, नहीं तो वह दिन दूर नहीं जब ‘एल्कोहलिक एनोनिमस’ की तरह पढ़े-लिखे गधों का संगठन भी कुकुरमुत्तों की तरह बढ़ जायेंगे।

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