(Editorial By Sukant Rajput)एक के बाद एक राज्यों में करारी शिकस्त के बाद भी गांधी-नेहरू वाली पार्टी के युवराज को यह समझ क्यों नहीं आ रहा कि जनता को पार्ट टाइम पॉलिटिक्स अब पसंद नहीं। भारतीय मतदाता वर्ग फुल टाइम पॉलिटिशियन पसंद करता है। विधानसभा हो या फिर आम चुनाव जनता को उनके लिए लड़ने वाला, काम करने वाला और जरुरी मुद्दों को उठाने वाला चाहिए। अरे…बाबा मछुआरा संग नदी में मछली पकड़ने, समुद्र में कुलानबाटी खाने, मोची से जूता बनाना सीखने या फिर काल्पनिक आरोप लगाने भर से जीत निर्धारित नहीं होगी। इन सब ध्यान खींचने वाले शटरांगों वाली भारतीय राजनीती को मतदाताओं ने ही अस्वीकार कर कर दिया है।

इन शार्ट यह पार्ट टाइम पॉलिटिक्स का दौर नहीं रहा। कांग्रेस बिहार चुनाव में अब तक का सबसे ख़राब प्रदर्शन की है। गठबंधन जितनी शिद्दत से कांग्रेस ने किया सामाजिक न्याय के मुद्दे को धार देने में उतनी मशक्कत नहीं किया। बिहार चुनाव में दलबदलुओं (एनडीए से आये नेताओं) को तवज्जो से नाराजगी बढ़ी। वोट चोरी के आरोपों ने भी बिगाड़ा खेल, रोजगार को राजनीतिक मुद्दा और एसआईआर जैसे मुद्दे भी दम तोड़ते नजर आये। कांग्रेस को बिहार चुनाव में वर्ष 1995 से लेकर 2025 तक के वोट परसेंट और अपने परफॉर्मेंस का आंकलन करना होगा।

वैसे ही एक करोड़ कार्यकर्ता बनाने का दावा करने वाली जनसुराज पार्टी को भी दस लाख वोट भी नहीं पड़े। राजनीती के कथित स्वयंभू गणित भी फेल हो गया। राजद के युवराजों का भी मुंह खोलकर नौकरी का झांसा देना उनके मुंह से जनता को भरोसा देने में नाकाबिल रहा। क्योंकि लालू का शासनकाल देखे मतदाता को सब याद है। करारी हार के बाद अब परिवार में विरासत की जंग भी शुरू हो सकती है। राजद को धरोहर का बोझ भरी पड़ेगा।
खैर चाणक्य की धरती में शाह के समीकरण, जदयू. सुप्रीमो नीतीश के सत्ता का स्थाईत्व और दलित नेता के रूप में पिता से भी आगे निकल चुके चिराग भी पासवान परिवार के युवराज हैं और अब सियासत के धूमकेतु भी बन गए हैं। जरुरत तो राहुल बाबा की पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को समझदार बनने की है। साथ ही युवराज को भी पार्टी और खुद की छवि नो पार्ट टाइम सियासत वाली बनानी पड़ेगी।







