0 स्टाफ, बजट, संसाधन से जूझ रहा रायपुर दूरदर्शन केंद्र, स्थानीय बोली, भाषा और कार्यक्रमों के प्रसारण का अकाल, छत्तीसगढ़ के प्रसारण केंद्र में स्थानीय भाषा में न्यूज नहीं
पुरन किरी/रायपुर
शहर सत्ता। Raipur Doordarshan Center : तत्कालीन मध्य प्रदेश और वर्तमान छत्तीसगढ़ राज्य का पहला दूरदर्शन केंद्र रायपुर में स्थापित हुआ था। अपनी स्थापना के तकरीबन 48 साल बाद भी रायपुर का दूरदर्शन केंद्र ताजा तरीन कार्यक्रमों के प्रसारण ही नहीं प्रोडक्शन में भी मुफलिस बना हुआ है। इसकी मुफलिसी की वजह है दिल्ली में बैठे आला अधिकारी और उदासीन सुचना प्रसारण मंत्रालय। लगातार अपर्याप्त बजट, कमतर संसाधन, पुरानी तकनीक के अलावा स्टाफ की गंभीर समस्या से दूरदर्शन रायपुर महाराष्ट्र, असम, तेलंगाना और अन्य क्षेत्रीय प्रसारण केंद्रों से पिछड़ता जा रहा है। छत्तीसगढ़िया फ़िल्मी गानों, दर्शकों को पसंद क्षेत्रीय भाषा की फ़िल्में, स्थानीय कलाकारों, लोक-संगीत, परिधान और संस्कृति पर आधारित कार्यक्रमों के प्रसारण की जगह हिंदी और सुगम संगीत को केंद्र तरजीह दे रहा है। विडंबना यह कि सबसे आसान छत्तीसगढ़ी न्यूज तक का प्रसारण या प्रोग्राम रायपुर दूरदर्शन केंद्र नहीं कर पा रहा।

Raipur Doordarshan Center : छत्तीसगढ़ CG दूरदर्शन केंद्र में अब 24 घंटे का प्रसारण (24-hour slot) शुरू हुए अरसा गुजर गया है। पहले यह साढ़े तीन घंटे के स्लॉट में सीमित था। इस बदलाव की शुरुआत वर्ष 2012 में हुई। जब खासी मांग के बाद क्षेत्रीय प्रसारण को ज्यादा समय देने का निर्णय लिया गया। फिलहाल, छत्तीसगढ़ दूरदर्शन में लगभग 5–6 प्रमुख कार्यक्रम ही नियमित रूप से चल रहे हैं। दिनभर के शेड्यूल में 11 तक के स्लॉट गिने जाते हैं, लेकिन इनमें से कुछ स्लॉट खाली रह जाते हैं। अनुमानित रूप से, पूरे 24 घंटे में अगर एक कार्यक्रम औसतन आधे घंटे का माना जाए, तो लगभग 48 कार्यक्रम दिखाए जा सकते हैं। विडम्बना यह है कि अभी चार-पांच कार्यक्रमों को ही रोटेशन में दिखाया जा रहा है।

दूरदर्शन केंद्र में दिन के समय ( 3 से शाम 7 बजे तक) मुख्य रूप से स्पॉन्सरशिप या केंद्र से आए हुए दिल्ली-निर्देशित कार्यक्रम चलते हैं। रात 11 बजे के बाद स्थानीय लोकसंगीत, छत्तीसगढ़ी नाचा, पंथी, करमा जैसे परंपरागत फोक प्रोग्राम शामिल किए जाते हैं। हिंदी सुगम संगीत, हिंदी न्यूज की बजाये छत्तीसगढ़ी में प्रस्तुति नहीं के बराबर है। रायपुर केंद्र के आला अधिकारीयों का कहना है कि छत्तीसगढ़ की बोली विविध और क्षेत्रीय रूप से बदलती है।

सरगुझिया, बस्तरिया, ओड़िया में उलझा केंद्र
एक प्रमुख चुनौती यह है कि छत्तीसगढ़ की बोली विविध और क्षेत्रीय रूप से बदलती है। अंबिकापुर और जगदलपुर जैसे इलाकों में छत्तीसगढ़ी का स्वरूप भिन्न होता हैं। इसलिए प्रसारण में शुद्ध छत्तीसगढ़ी भाषा की जगह हिंदी मिश्रित CG छत्तीसगढ़ी का प्रयोग किया जाता है। ताकि ज्यादा से ज्यादा दर्शकों तक बात पहुंच सके।
“हमारा लक्ष्य है कि लोकसंगीत, पारंपरिक नृत्य, और छत्तीसगढ़ की संस्कृति को ज्यादा समय और जगह दी जाए। इसके लिए हमें प्रोडक्शन और रिकॉर्डिंग दोनों स्तर पर क्षेत्रीय बोली के मुताबिक काम करना होता है, ताकि स्थानीय लोग भी जुड़ाव महसूस कर सकें। दूरदर्शन रायपुर के अलावा जगदलपुर और अंबिकापुर के केंद्रों में भी रिकॉर्डिंग होती है, जहां स्थानीय भाषा और विषयवस्तु को ध्यान में रखकर कार्यक्रम तैयार किए जाते हैं। हालांकि, सीमित संसाधनों और दर्शकों की विविधता को ध्यान में रखते हुए, चैनल को अपनी प्रस्तुति में हिंदी का सहारा लेना पड़ता है, ताकि छत्तीसगढ़ के ग्रामीण इलाकों तक भी प्रभावी संदेश पहुंच सके। बड़ी समस्या यह भी है कि छत्तीसगढ़ी फिल्मों और गानों के राइट्स अक्सर मुंबई या दिल्ली के प्रोडक्शन हाउसेज़ के पास होते हैं। “अगर हम अपने रिजनल कंटेंट को दिखाना भी चाहें, तो हमें अप्रूवल्स और कॉपीराइट की लंबी प्रक्रिया में उलझना पड़ता है।”
प्रदीप कुमार श्रीवास्तव, सहा.निदेशक कार्यक्रम, रायपुर दूरदर्शन केंद्र

बड़े सपनों के लिए केंद्र की छोटी जेब
DD Chhattisgarh के अधिकारियों ने बातचीत में साफ कहा कि उनका सालाना बजट महज ₹50 लाख है। इस रकम में स्टूडियो का रखरखाव, प्रोग्राम्स का निर्माण, डॉक्यूमेंट्री, लोकसंगीत शो, कृषि आधारित कार्यक्रम, सब कुछ शामिल करना होता है। तुलना करें, तो तेलंगाना जैसे राज्यों में डीडी स्टूडियो अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस हैं। जबकि छत्तीसगढ़, जहां दूरदर्शन केंद्र 1977 में स्थापित हुआ और वर्ष 2000 में राज्य बना, अब तक बुनियादी संसाधनों के लिए जूझ रहा है।
प्रसारण स्लॉट, खाली समय, खाली वादे
24 घंटे के प्रसारण में व्यावहारिक रूप से केवल 5–6 कार्यक्रम ही नियमित रोटेशन में चलते हैं। तकनीकी रूप से हर आधे घंटे में नया शो दिखाया जा सकता है, यानी 48 स्लॉट, लेकिन हकीकत में कई स्लॉट खाली या दिल्ली से भेजे गए सेंट्रल प्रोग्राम्स से भर दिए जाते हैं। लोकसंगीत, पंथी, करमा जैसे छत्तीसगढ़ी रंगों को रात 11 बजे के बाद स्लॉट मिलता है, यानी prime time तक ये संस्कृति पहुँच ही नहीं पाती।

हल्बी, गोंड़िन, सरगुझिया और छत्तीसगढ़िया समस्या
अंबिकापुर, जगदलपुर, बिलासपुर हर इलाके में छत्तीसगढ़ी भाषा का अपना रंग, अपना लहजा है। इसलिए डीडी छत्तीसगढ़ को ‘हिंदी मिश्रित छत्तीसगढ़ी’ का रास्ता अपनाना पड़ता है, ताकि पूरे राज्य के दर्शक जुड़ सकें। असली लोकभाषा की आत्मा बनाए रखकर सबको जोड़ना यह भी एक बड़ी चुनौती है।
स्टाफ की किल्लत, आधे लोग, दोगुना काम
एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक “2002 में 11 कैमरामैन थे, अब स्टाफ आधा रह गया है। पहले प्रोग्राम हेड डायरेक्टर रैंक का होता था। अब चार रैंक नीचे वाले को हेड बना दिया जाता है।” इससे न सिर्फ प्रोडक्शन क्वालिटी पर असर पड़ता है, बल्कि टीम का मनोबल भी गिरता है। DD Chhattisgarh छत्तीसगढ़ दूरदर्शन का 24 घंटे का प्रसारण विस्तार, कागज़ पर भले ही एक बड़ी सफलता दिखता हो, लेकिन असल में यह तभी सफल हो सकता है जब कलाकारों को रचनात्मक स्वतंत्रता, संस्थानों को पर्याप्त संसाधन, और प्रोड्यूसरों को स्पष्ट, पारदर्शी संरचना मिले। यह लड़ाई सिर्फ सरकारी संस्थानों की नहीं, बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ की है — अपनी पहचान, अपनी बोली, अपनी संस्कृति को बचाने और आगे ले जाने की लड़ाई। और इस लड़ाई में हर दर्शक, हर कलाकार, हर नीति निर्माता की भूमिका अहम होगी।

कमीशन प्रोग्राम्स और स्पॉन्सरशिप, कलाकारों और प्रोड्यूसरों की

दूरदर्शन का रायपुर केंद्र तभी लोकप्रिय और स्थानीय निर्माताओं के लिए उपयोगी होगा, जब यहां भी कमिशंड प्रोग्राम तथा छत्तीसगढ़ी फिल्मों का प्रसारण प्रारंभ होगा। साथ ही प्रसार भारती को अपने कुछ दकियानूसी नियम में बदलाव करना पड़ेगा। केंद्र को अब यहां के आकाशवाणी एवं दूरदर्शन में स्थानीय फिल्में,एवं उनके गाने रॉयल्टी पर चलाने का अधिकार दे देना चाहिए। अफ़सोस है कि यहां से वीसी शुक्ला,एवं रमेश बेस जैसे केंद्रीय सूचना प्रसारण मंत्री के रहते हुए भी छेत्र का कुछ ज्यादा भला नहीं हो पाया। अब जबकि छत्तीसगढ़ी फिल्में और उनके गाने भी घर घर में पसंद किए जा रहे है, तो उनका प्रसारण भी किया जाना चाहिए।
संतोष जैन, अध्यक्ष छग. सिने टेलीविजन प्रोड्यूसर एसो.

छत्तीसगढ़ी फिल्म एसोसियेशन लगातार प्रयासरत रहा है की छत्तीसगढ़ी फिल्मों और गीत-संगीत को प्रसार भारती के मंच से जगह मिले। पहले यह सारी गतिविधियाँ स्पॉन्सर्ड प्रोग्राम्स के तहत चलती थीं, जहाँ हमें स्लॉट लेकर अपने गानों और फिल्मों का प्रचार-प्रसार करना पड़ता था। उस समय यह व्यवस्था सीमित थी, लेकिन अब जब दूरदर्शन 24 घंटे का चैनल बन चुका है और आकाशवाणी की पहुँच भी काफी बढ़ गई है, ऐसे में उम्मीद की जा रही है कि आने वाले समय में छत्तीसगढ़ी फिल्मों और गीतों का नियमित प्रसारण इन सरकारी माध्यमों से सुनिश्चित होगा। हमें मिलकर यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हमारी भाषा, हमारी फिल्में, और हमारा संगीत अधिक से अधिक दर्शकों और श्रोताओं तक पहुँचे, ताकि हमारी संस्कृति की जड़ें और भी गहरी हो सकें और आने वाली पीढ़ियों तक सजीव रह सकें।
मनोज वर्मा, सचिव, छग. सिने टेलीविजन प्रोड्यूसर एसो.





