संपादकीय•सुकांत राजपूत

उपकरणों के द्वारा, टीवी – मोबाइल से पता नहीं कितने विचार रोज हमारे मन तक पहुंच रहे हैं। कुछ विचार हमें निराश कर देते हैं। जो हमें निराश कर देते हैं। ऐसे विचारों से बचें। अच्छे विचार हमारे जीवन में दिव्यता ला सकते हैं। (Editorial by sukant rajput) अगर हमारी संगति सकारात्मक और सात्विक है तो जीवन में उन्नति जरूर मिलेगी। खुद की, अपने परिजनों की और मित्रों की उन्नति के लिए बहुत आवश्यक भी है। लेकिन आज की पीढ़ी और उनकी मित्रमंडली उपकरणों से मिल रही ज्यादातर बुरी और कमतर अच्छी विचारधाराओं में उलझकर रह गई है। किशोर मन विचलित हो रहा है और सब कुछ जानने उसे महसूस करने के लिए तत्पर भी है। कोलकाता व्यभिचार में लिप्त आरोपियों की मनोदशा भी उपकरणों की उत्तेजना का ही परिणाम है। यहां संगती और सत्संग भी अहम् भूमिका में है।
हमें अपनी आत्मा पर दो बार काम करना चाहिए- सोने के पहले, उठने के बाद। फिर शरीर पर चार बार काम करना चाहिए- स्नान, पूजन, भोजन, शयन के समय। लेकिन मन पर प्रतिपल काम करना पड़ेगा। मन का मामला ऐसा है कि आपने जरा-सा मौका दिया तो मन काम दिखा जाएगा। सवाल उठता है मन पर प्रतिपल किन बातों का काम किया जाए। मन का संयम और शरीर की सावधानी- इससे आप ठीक हो जाएंगे। लेकिन
के प्रभाव से बीमार हुए तो इलाज आप ही को करना पड़ेगा। क्योंकि मन जो भीतर करता है, ये बाहर किसी को तभी पता चलता है जब घृणित कार्य के बाद परिणाम सामने होता है।
भारत में रात को सोने के पहले 80% लोग उपकरणों का उपयोग करते हैं और जब इलेक्ट्रॉनिक गैजेट हाथ से गिर जाता है, तब सोते हैं। 10 से 11 के बीच सोना सबसे अच्छा है। सोते समय और उठने के तुरंत बाद भी हमें उपकरणों से दूरी बनाए रखना चाहिए। उपकरण हमारे भीतर की जैविक घड़ी को बिगाड़ रहा है। इन्हीं वजहों से तो हम चिड़चिड़े हो रहे हैं। इसको अंग्रेजी में सर्केडियन रिदम कहते हैं। यह अच्छे-अच्छों का बिगड़ा हुआ है। अगर आप देर रात तक जाग रहे हैं, तो आपकी जैविक घड़ी गड़बड़ाएगी। दिनभर हम कामकाज, रिश्तों का दबाव लेते हैं और फिर उपकरणों के ब्लैक होल में समाते जाते हैं। स्वाभिक है ऐसे में रिश्ते और विचार आपके उपकरणीय यंत्रों के स्वादानुसार ही आएंगे।





