manmohanthakur Archives - शहर सत्ता https://shaharsatta.com/tag/manmohanthakur/ Fri, 30 May 2025 17:42:07 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.1 Chhollywood: रामलीला के लक्ष्मण से “गिरधारी” तक स्टारडम का सफर… https://shaharsatta.com/2025/05/30/chhollywood-the-journey-of-stardom-from-ramlilas-laxman-to-girdhari/ https://shaharsatta.com/2025/05/30/chhollywood-the-journey-of-stardom-from-ramlilas-laxman-to-girdhari/#respond Fri, 30 May 2025 17:39:43 +0000 https://shaharsatta.com/?p=2534 0 मनमोहन की सिने ज़िंदगी की असल और अनकट कहानी उनकी जुबानी   शहर सत्ता/रायपुर। छइयां भुइंया के ‘गिरधारी’ यानि की छत्तीसगढ़ (Chhollywood) के असली माटी पुत्र ठाकुर मनमोहन सिंह…

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0 मनमोहन की सिने ज़िंदगी की असल और अनकट कहानी उनकी जुबानी

 

शहर सत्ता/रायपुर। छइयां भुइंया के ‘गिरधारी’ यानि की छत्तीसगढ़ (Chhollywood) के असली माटी पुत्र ठाकुर मनमोहन सिंह बचपन में गाँव की रामलीला में लक्ष्मण का किरदार निभाया करते थे। लोगों की तालियों और तारीफों ने उनके अंदर एक कलाकार को जन्म दिया। धीरे-धीरे लोग कहने लगे हीरो जैसा दिखता है तू,और यही बात दिल में उतर गई। इसी उम्मीद के साथ निकल पड़े सपनों की नगरी मुंबई की ओर। लेकिन मुंबई में सपने जितने बड़े थे, संघर्ष उससे भी महाकाय निकला। तीन साल तक लगातार मेहनत, ऑडिशन, रिजेक्शन और मायूसियों के बाद हारकर वापस गाँव लौटना पड़ा। लगा सब खत्म हो गया।फिर एक दिन मौका मिला फिल्म छइहा भुइया में खलनायक ‘गिरधारी’ का किरदार। इस रोल ने न सिर्फ गाँव बल्कि शहर तक में तहलका मचा दिया। लोग उनका असली नाम भूल गए और ‘गिरधारी’ के नाम से पहचानने लगे। आज भी मनमोहन को लोग उसी नाम से पुकारते हैं, मनमोहन उर्फ गिरधारी।

संघर्ष और सिद्धांत की कहानी

विलन होते हुए भी मैंने फिल्में छांट कर की। मनमोहन ने यह साबित कर दिया कि एक अभिनेता का आत्मसम्मान उसकी सबसे बड़ी पूंजी होती है। (Chhollywood) उन्होंने कभी ‘हीरो-हीरोइन की मर्जी’ वाली फिल्मों में घुसपैठ नहीं की, बल्कि खुद के टैलेंट पर विश्वास रखा। कोई ताकत मुझे बिजी नहीं देखना चाहती थी। ये लाइन छत्तीसगढ़ी फिल्म इंडस्ट्री में छिपी हुई राजनीति की गहराई तक झांकती है। एक कलाकार के संघर्ष को दबाने की कोशिशें हर कोने में दिखीं। निजी रिश्ते, गलतफहमियाँ और टूटता विश्वास भी सहा हूं।

रिश्ते में आई दरार,पर हद में किया विरोध

लेकिन हर रिश्ते में दरार किसी एक घटना से नहीं, बल्कि राजनीति और आर्थिक खेलों से आती है।(Chhollywood) मेकअप लगा था, डांस कर रहा था, लेकिन अचानक एल्बम से हटा दिया गया। एक कलाकार के आत्मसम्मान को झकझोरने वाला अनुभव। मनमोहन ने प्रतिक्रिया में बाल और दाढ़ी तक मुंडवा दी — ये केवल लुक चेंज नहीं, एक मानसिक विद्रोह था। छत्तीसगढ़ी सिनेमा में सियासी खौफ का आलम है। यहाँ जो पॉलिटिक्स होती है, वैसी असल राजनीति में भी नहीं होती। मनमोहन की यह टिप्पणी इंडस्ट्री में पनपते अहंकार और गुटबाज़ी पर सीधा वार है। यूनियन बनाकर क्या करोगे, जब कलाकार ही अपने हक के लिए खड़े नहीं होते। यह सिस्टम नहीं, कलाकारों की निष्क्रियता पर सवाल है।

खलनायक बना फिर भी निर्विवाद रहा

मनमोहन का इंडस्ट्रीज में गुटबाजी, प्रतिस्पर्धा और मनमुटाव को लेकर स्पष्ट लेकिन सटीक संदेश है। (Chhollywood) उनका मानना है कि जो भी मतभेद हैं, पर्दे के पीछे रहना चाहिए, क्योंकि हम जैसे कलाकार आप जैसे लोगों से सीखते हैं। यह कथन विनम्रता, अनुभव और समर्पण का अद्भुत उदाहरण है। एक सच्चा कलाकार वही है, जो तमाम विवादों के बीच भी गरिमा बनाए रखे। मनमोहन की कहानी केवल एक कलाकार की नहीं, बल्कि हर उस इंसान की है जो संघर्ष करता है, टूटता है, मगर सिद्धांतों से समझौता नहीं करता। “गिरधारी” बनकर लोगों के दिलों में जगह बनाई, और मनमोहन बनकर सिनेमा में अपनी सच्ची पहचान कायम रखी।

भूपेश सरकार ने बरती उदासीनता, लेटलतीफी

छत्तीसगढ़ फिल्म विकास निगम को लेकर मेरा स्पष्ट मत है, इसे धीमी गति देने का सबसे बड़ा जिम्मेदार भूपेश बघेल और उनकी कांग्रेस सरकार है। पिछले 5 वर्षों तक प्रदेश में कांग्रेस की सरकार रही। फिल्म विकास निगम की नीति पहले से तैयार थी, सब्सिडी की व्यवस्था भी प्रस्तावित थी, मगर उसके बावजूद निगम की स्थापना नहीं की गई। जब सारी रूपरेखा तय थी, तो इसे अमल में लाने से किसने रोका? साफ है कि (Chhollywood) फिल्म विकास निगम के गठन में देरी, और उसे रोकने में कांग्रेस सरकार की बड़ी भूमिका रही है। अब जब हमारी सरकार आई है, तो हमने फिल्म सिटी की घोषणा कर दी है, और इसके लिए केंद्रीय फंड भी आ चुका है। डेढ़ से दो साल के भीतर फिल्म सिटी बनकर तैयार हो जाएगी। जहाँ तक फिल्म विकास निगम की स्थापना का सवाल है, तो अभी आयोग की 16 या 18 पदों की लिस्ट बची हुई है। संभव है कि आने वाले दिनों में उसमें अध्यक्ष की घोषणा हो जाए और निगम का गठन पूरा हो जाए।

हिंदी से ज्यादा क्षेत्रीय फिल्म को मिले सब्सिडी

भूपेश बघेल सरकार ने एक पक्षपातपूर्ण नीति बनाई थी, जिसमें छत्तीसगढ़ी फिल्मों को कम और हिंदी फिल्मों को ज़्यादा सब्सिडी देने की बात थी।(Chhollywood) मैं चाहता हूँ कि यह नियम बदला जाए। कम से कम 50-50 का अनुपात होना चाहिए, बल्कि चूंकि यह छत्तीसगढ़ राज्य का फिल्म विकास निगम है, तो छत्तीसगढ़ी फिल्मों को 60% सब्सिडी मिलनी चाहिए और हिंदी को 40%। मुझे आशा है कि माननीय मुख्यमंत्री जी इस विषय को गंभीरता से लेंगे और छत्तीसगढ़ी सिनेमा को न्याय दिलाने के लिए ठोस कदम उठाएंगे। बाहरी लोगों को निगम में स्थान देने की जो नीति कांग्रेस सरकार ने बनाई थी, वह छत्तीसगढ़ी आवाज़ को दबाने वाली थी। अब समय है कि हम अपनी भाषा, अपनी संस्कृति और अपने सिनेमा को प्राथमिकता दें।

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