-हरिदास
(Weekly Column khurchan)हिन्दी पत्रकारिता के दो सौ साल पूरे हो गए। यह कम उपलब्धि नहीं है। दो सौ साल में आदमी लगभग दो से तीन बार फिर से जन्म ले कर अपना एक पैर कब्र में रख चुका होता है, अनेक संस्थाओं का तो नामो-निशान मिट जाता है और विचारधाराएँ भी अपना दल बदल लेती हैं, मगर हिन्दी पत्रकारिता अभी भी जीवित है। हालांकि उसे पहचानने के लिए कहीं-कहीं पर आधार कार्ड लग सकता है।
कोलकाता के प्रसिद्ध बड़ा बाजार के समीप, 37, अमर तल्ला लेन, कोलूटोला से 30 मई, 1826 को भारत का पहला हिंदी समाचार पत्र ‘उदन्त मार्तण्ड’ शुरू हुआ था। इसकी नींव रखी थी पं. जुगल किशोर शुक्ल जी ने। उन्होंने उस ब्रिटिश दौर में कठिन संघर्ष किया था। इतिहास के पन्नों में अनेक बाते दर्ज हैं। विश्वविद्यालयों में पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहे विद्यार्थियों से परीक्षा में अब इस पर सवाल पूछा जाना भी लगभग बंद हो गया है। सवाल बनाने वाले मूर्धन्यगण भी उदन्त मार्तण्ड शब्द के अर्थ से अनभिज्ञ रहते हैं। हिन्दी पत्रकारिता के साथ ही हिन्दी के पत्रकारों का संघर्ष भी बीते 200 वर्षों से जारी है। स्व. जुगल किशोर शुक्ल और भारतेंदु हरिशचंद्र की आत्मा आज यह देखकर कलप रही होगी कि हिन्दी पत्रकारिता खबरों से ज्यादा “एक्सक्लूसिव”, “बिग ब्रेकिंग” जैसे विशेषणों का उत्पादन कर रही है। पहले अखबार जनता को बताता था कि देश में क्या हो रहा है। अब चैनल जनता को बताते हैं कि देश को किस बात पर नाराज़, गर्वित, भयभीत और भावुक होना चाहिए। पहले पत्रकार सत्ता से असुविधाजनक प्रश्न पूछता था। आजकल कई पत्रकार सत्ता से इतने विनम्र प्रश्न पूछते हैं कि प्रश्न कम, सरकारी धन्यवाद ज्ञापन ज्यादा लगते हैं। कुछ एंकरों ने निष्पक्षता को ऐसे त्यागा है जैसे नेता चुनाव बाद घोषणा-पत्र को त्यागता है।
हिन्दी पत्रकारिता ने दो सौ साल में बड़ी छलांग लगाई है। पहले खबर के पीछे रिपोर्टर भागता था, अब रिपोर्टर के पीछे टीआरपी, एल्गोरिद्म और मालिक का व्हाट्सऐप संदेश भागता है। न्यूजरूम अब समाचार कक्ष कम, ध्वनि प्रदूषण प्रयोगशाला अधिक लगते हैं। पाँच लोग एक साथ चिल्लाते हैं, स्क्रीन आठ हिस्सों में बँटती है, नीचे पट्टी भागती है, ऊपर राष्ट्र भागता है और बीच में कहीं खबर दम तोड़ देती है। आज हिन्दी पत्रकारिता में सत्य वही है जो प्राइम टाइम तक टिक जाए। विचार वही है जो ट्रेंड कर जाए। और राष्ट्रहित वही है जिसे स्पॉन्सर आपत्ति न करे।
हिन्दी पत्रकारिता भले ही आक्सीजोन की शरण में हो, लेकिन समस्याएँ दो सौ साल से हष्ट-पुष्ट हैं, तब पाठक कम थे और आज खबरें कम लेकिन चैनल ज्यादा हैं। इसलिए एक ही खबर को दिन भर चबाने, तलने, भुनने के बाद रात नौ बजे राष्ट्रवाद की चटनी लगाकर परोसा जाता है। पहले पत्रकारिता में “समाचार” होता था। अब “नैरेटिव” होता है। आज का न्यूजरूम बड़ा लोकतांत्रिक है। वहाँ हर किसी को बोलने की आज़ादी है, बशर्ते वह मालिक, मार्केटिंग विभाग, राजनीतिक समीकरण, विज्ञापनदाता और टीआरपी की भावना के अनुकूल बोले। बाकी जो चमकता दिख रहा होता है, वह पत्रकारिता कम, स्टूडियो-निर्मित राष्ट्रीय नाट्य महोत्सव ज्यादा लगता है। अखबारों की हालत भी कम रोचक नहीं। पहले संपादकीय पढ़कर पाठक की सोच बना करती थी। अब कई बार पाठक पहले यह सोचता है कि यह खबर है, विज्ञापन है या किसी की पीआर एजेंसी की साहित्यिक अभिव्यक्ति। ऊपर से अंग्रेजी के शब्दों के तड़के के बिना हिन्दी के अखबारों का भी काम नहीं चलता। विडंबना देखिए — हिन्दी पत्रकारिता दिवस पर सबसे ज्यादा पोस्ट अंग्रेज़ी फॉन्ट में लिखी जाती हैं—
“Hindi Patrakarita Diwas ki hardik wishes!”
खैर…हिन्दी पत्रकारिता दिवस के दो सौ वर्ष पूरे होने पर अनेक समारोह होंगे, सेमिनार होंगे, स्मारिका निकलेगी, वक्तव्य होंगे। हमेशा की तरह संकल्प लेंगे तोड़े जाने के लिए और फिर मिलेंगे अगली बरसी पर…फिर भी उम्मीद बाकी है। क्योंकि अभी भी कहीं कोई पत्रकार जिला अस्पताल की बदहाली लिख रहा है, कोई किसान की आत्महत्या की खबर भेज रहा है, कोई आदिवासी गाँव की प्यास को शब्द दे रहा है। हिंदी पत्रकारिता अभी भी कहीं किसी छोटे कस्बे के रिपोर्टर की टूटी मोटरसाइकिल में सांस ले रही है; किसी फ्रीलांसर की बकाया भुगतान वाली फ़ाइल में पड़ी है; किसी जिला संवाददाता की जेब में रखी पुरानी डायरी में जिंदा है। उन सभी को साधुवाद जिन्होंने बिना किसी हिंग्लिश और क्लिष्ट शब्दों के हिन्दी पत्रकारिता को बचाए रखा है। हिन्दी पत्रकारिता दिवस के 200 वर्ष पूर्ण होने पर आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं…






