
संपादकीय – सुकांत राजपूत
शहरसत्ता/रायपुर. (Editorial by Sukant Rajput) किसी ने बजा फ़रमाया है कि “लोकतंत्र में व्यवस्था देना सरकार का काम है। कार्यपालिका इसलिए जनता का पैसा लेती है, ताकि उनको सुरक्षा और सम्मान दे।(Editorial by Sukant Rajput) बेंगलुरु भगदड़ मामले ने हमें एक बार फिर से भीड़ प्रबंधन और सुरक्षा व्यवस्था की अहमियत से अवगत कराया है। बड़े आयोजनों में जिम्मेदारी केवल आयोजकों की ही नहीं होती, बल्कि प्रशासन, पुलिस और संबंधित अधिकारी भी सुरक्षा के लिए पूरी तरह सतर्क और तैयार रहना चाहिए। जल्दबाजी में अनुमति देना और सुरक्षा का अभाव न केवल मानवीय जीवन के लिए खतरा है, बल्कि समाज में अस्थिरता भी ला सकता है।खुशियों के बीच जश्न मनाते काल के ग्रास बने उन 11 बदनसीबों का लौटना नामुमकिन है और परिवार का रिक्त स्थान भी भरना संभव नहीं है। राजनीतिक दलों ने भी इस पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। भाजपा सहित कई विपक्षी पार्टियों ने मुख्यमंत्री और डिप्टी मुख्यमंत्री के इस्तीफे की मांग की है। उनका आरोप है कि सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह नाकाफी थी और प्रशासन की बड़ी लापरवाही के कारण यह हादसा हुआ। वहीं सरकार ने मृतकों के परिजनों को 10 लाख रुपये का मुआवजा देने का ऐलान किया है, ताकि प्रभावित परिवारों को आर्थिक मदद मिल सके।इस दर्दनाक आयोजन ने ऐसे कई यक्ष प्रश्न भी खड़े किये हैं जिनके जवाब जांच रिपोर्ट में आने चाहिए। क्या आयोजन के लिए पुलिस को समय पर सूचना दी गई थी? क्या सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम किए गए थे? टीम मैनेजमेंट और आयोजकों की भूमिका क्या थी? पुलिस या प्रशासन ने भीड़ नियंत्रण के लिए क्या कदम उठाए? (Editorial by Sukant Rajput) जांच कमेटी की रिपोर्ट कब आएगी और क्या इसमें पारदर्शिता रहेगी? इस चूक भरे आयोजन में जान गंवाने वालों का आखिर हत्यारा कौन है?सस्ती सियासत, मामूली लोकप्रियता और बदइंतजामी की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।आयोजन से करोड़ों रूपये बटोरने वाले सभी जिम्मेदारों को बिना किसी भेदभाव के आरोपी बनाना होगा। बेंगलुरु भगदड़ मामले ने हमें एक बार फिर से भीड़ प्रबंधन और सुरक्षा व्यवस्था की अहमियत से अवगत कराया है। बड़े आयोजनों में जिम्मेदारी केवल आयोजकों की ही नहीं होती, बल्कि प्रशासन, पुलिस और संबंधित अधिकारी भी सुरक्षा के लिए पूरी तरह सतर्क और तैयार रहना चाहिए। जल्दबाजी में अनुमति देना और सुरक्षा का अभाव न केवल मानवीय जीवन के लिए खतरा है,(Editorial by Sukant Rajput) बल्कि समाज में अस्थिरता भी ला सकता है। इसलिए अब जरूरत है कड़े कानूनों, स्पष्ट नियमों और कड़े सुरक्षा मानकों की ताकि भविष्य में ऐसी घटनाएं दोबारा न हों। बेटे की कब्र से लिपट गया पिता:बोला- मुझे यहीं रहना है। कमोबेश यही आलम उन 10 मृतकों के परिजनों का है।







