0 मुंबई के एक फिल्म स्कूल से प्रारंभ और 15 साल के छत्तीसगढ़ी सिनेमा का सफर किये एडिटर गौरांग ने साझा किया अनुभव
शहर सत्ता/रायपुर। मुंबई के एक फिल्म स्कूल से 15 साल पहले करियर की शुरुआत करने वाले इस अनुभवी एडिटर गौरांग दिवेदी ने (chhollywood) अब तक डॉक्यूमेंट्री और कमर्शियल सिनेमा, दोनों में हाथ आजमाया है। एडिटिंग सॉफ्टवेयर में वह Final Cut Pro (FCP) को प्राथमिकता देते हैं क्योंकि इसे ऑपरेट करना आसान है और एक्सपोर्ट प्रक्रिया तेज़ होती है। किसी भी प्रोजेक्ट पर काम शुरू करने से पहले वह स्क्रिप्ट को ध्यान से पढ़ते हैं और डायरेक्टर के साथ गहन चर्चा करते हैं। गौरांग का मानना है कि डायरेक्टर का फीडबैक एडिटिंग को आसान बना देता है। उनके अनुसार हर फिल्म अपने साथ एक नया चैलेंज लेकर आती है, और वहीं असली मज़ा भी है। एक अच्छी एडिटिंग की सबसे बड़ी पहचान वह टाइट स्क्रीन प्ले और सही कट-साउंड इफेक्ट को मानते हैं। वे खुद साउंड मिक्सिंग और कलर करेक्शन नहीं करते,बल्कि मानते हैं कि हर काम के लिए एक्सपर्ट को ज़िम्मेदारी सौंपना ज़्यादा अच्छा रिज़ल्ट देता है।
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उनकी पसंदीदा एडिटिंग जॉनर कोई एक नहीं सभी है। उनके लिए अच्छी कहानी और शानदार सिनेमैटोग्राफी ही असली मोटिवेशन है।(chhollywood) अपनी स्किल्स को अपडेट रखने के लिए वह लगातार फिल्में देखते हैं और उनसे सीखते रहते हैं। स्टूडियो में फिल्म, म्यूजिक वीडियो, शॉर्ट फिल्म, डॉक्यूमेंट्री, कॉर्पोरेट वीडियो जैसी सभी एडिटिंग सर्विस दी जाती है, लेकिन फिलहाल उनका फोकस मुख्य रूप से फिल्मों पर है।छत्तीसगढ़ी सिनेमा के बदलावों पर बात करते हुए वह कहते हैं, पहले गिने-चुने मेकर्स ही थे, इसलिए एक ही जैसी फिल्में बनती थीं। लेकिन नए मेकर्स के आने से सिनेमा धीरे-धीरे बदल रहा है। हमें रिस्क लेना होगा और दर्शकों को नई कहानियों और सब्जेक्ट्स की आदत डालनी होगी। हाल के 2-3 सालों में कुछ अच्छी फिल्मों का निर्माण हुआ है, जिनके ट्रेलर से लगता है कि बदलाव की कोशिश शुरू हो चुकी है। एडिटिंग के स्तर पर सुधार की ज़रूरत पर वह बताते हैं कि संसाधन तो हैं, लेकिन ज़रूरत है फिल्म स्कूलों की, जहां एडिटर्स को फिल्म एडिटिंग और दूसरी एडिटिंग में फर्क सिखाया जाए। इसके अलावा सेमिनार और ट्रेनिंग की भी सख्त जरूरत है।
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जब उनसे पूछा गया कि अगर उन्हें फुल क्रिएटिव फ्रीडम मिले तो वे क्या नया करना चाहेंगे, उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “मैं छत्तीसगढ़ी (chhollywood) फिल्मों में एडिटिंग को लेकर नए-नए एक्सपेरिमेंट करना चाहूंगा। हाल ही में मेरी फिल्म गुइयाँ 2 में मैंने एडिटिंग में नयापन देने की कोशिश की थी, जो दर्शकों ने पसंद किया। आगे भी मैं कहानी और स्क्रीनप्ले को ध्यान में रखते हुए नए प्रयोग करने की इच्छा रखता हूँ, ताकि हमारा सिनेमा और आगे बढ़ सके।” यह सफर दिखाता है कि छत्तीसगढ़ी सिनेमा में बदलाव की लहर आ चुकी है, बस जरूरत है तो और ज्यादा जुनून और एक्सपेरिमेंट की।







