मुरादाबाद (एजेंसी)।| ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद देशभर में भारतीय सेना और वायुसेना की सराहना हो रही है, लेकिन अब इस पर जातिगत राजनीति के आरोप भी लगने लगे हैं। समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता और सांसद रामगोपाल यादव ने गुरुवार को मुरादाबाद में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान सेना में शामिल अधिकारियों की जाति का उल्लेख कर राजनीतिक घमासान खड़ा कर दिया है।

रामगोपाल यादव ने कहा कि एयरफोर्स की विंग कमांडर व्योमिका सिंह हरियाणा की जाटव समुदाय से हैं और ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की सफलता में उन्होंने अहम भूमिका निभाई। इसी के साथ उन्होंने एयर ऑपरेशन की अगुवाई करने वाले एयर मार्शल अवधेश कुमार भारती यादव और सेना की कर्नल सोफिया कुरैशी का नाम लेते हुए कहा कि “यह लड़ाई दरअसल पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक (PDA) वर्ग ने लड़ी है, भाजपा इसका श्रेय लेने की कोशिश कर रही है।”

“जाति से पहचान और युद्ध से राजनीति नहीं होनी चाहिए”
राजनीतिक गलियारों में इस बयान को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। विश्लेषकों का कहना है कि सेना की कार्यशैली और योगदान को जातिगत नजरिए से देखना बेहद अनुचित और खतरनाक परंपरा की शुरुआत हो सकती है। रक्षा विशेषज्ञों ने कहा कि सैनिकों की पहचान उनके कर्तव्य, साहस और सेवाकाल से होनी चाहिए, न कि उनकी जाति या धर्म से।
महिला अफसरों पर दोहरी सियासत?
रामगोपाल यादव का बयान ऐसे समय आया है जब कुछ ही दिन पहले मध्य प्रदेश के एक मंत्री ने कर्नल सोफिया कुरैशी को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी की थी। उस मामले में हाईकोर्ट ने FIR के आदेश दिए और अब मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है।
वहीं, विंग कमांडर व्योमिका सिंह के संदर्भ में जातिगत पहचान को उजागर कर राजनीतिक बयान देने पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं।
विंग कमांडर व्योमिका: एक प्रेरणादायक सफर
विंग कमांडर व्योमिका सिंह पिछले 21 वर्षों से भारतीय वायुसेना में सेवाएं दे रही हैं। वे स्पेशलिस्ट हेलिकॉप्टर पायलट हैं और चेतक तथा चीता जैसे हेलिकॉप्टरों को दुर्गम पहाड़ी इलाकों में उड़ाने का अनुभव रखती हैं। अरुणाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर में उनके नेतृत्व में कई राहत एवं बचाव अभियान सफलतापूर्वक संचालित किए गए हैं।
भाजपा पर भी कटाक्ष
रामगोपाल यादव ने भाजपा की ‘तिरंगा यात्रा’ पर निशाना साधते हुए कहा कि “अगर युद्ध सेना ने लड़ा है, तो उसका श्रेय अकेली पार्टी कैसे ले सकती है?” उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा सेना के पराक्रम को चुनावी एजेंडे में बदल रही है।
क्या कहता है संविधान और परंपरा?
भारतीय सशस्त्र बलों को हमेशा से गैर-राजनीतिक और धर्मनिरपेक्ष संस्थान माना गया है। इनमें सेवा करने वाले अधिकारी राष्ट्र के प्रति निष्ठा की शपथ लेते हैं, न कि किसी जाति या पार्टी के प्रति। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के बयानों से सेना की तटस्थता और गरिमा को ठेस पहुंचती है।
समाप्ति पर सवाल:
क्या आने वाले समय में सैनिकों की बहादुरी को भी राजनीतिक चश्मे से देखा जाएगा?
और क्या ऐसी बयानबाजियाँ राष्ट्रहित में हैं?
इस सवाल का जवाब अब केवल राजनीति को नहीं, समाज और लोकतंत्र को भी देना होगा।







